लघुकथा

गुनगुनी धूप

मेरे घर के सामने वाले घर पर जाड़े के दिनों में कभी धूप नहीं आती।
एक दिन मैंनें सामने वाले भाई साहब से पूछ लिया-आजकल मां जी नहीं दिखाई पड़ती ,क्या बाहर गई हैं।
अरे नहीं भाई! ठंडक इतनी है कि उन्हें बाहर बैठा नहीं सकता। इस अवस्था में कहीं तबियत बिगड़ गई तो और मुश्किल होगी। आपको तो पता ही है कि मेरे घर पर ठंडक में धूप भूलकर भी नहीं आती।
बस! इतनी सी बात के लिए आप माँ को कैद रखते हैं। गलत बात है। आज से माँ मेरे घर के आँगन में पूरे समय धूप का आनंद लेंगी। शरीर को धूप की बहुत जरूरत है। बिना धूप के तो बीमार भी पड़ सकती हैं।
मगर….।
अगर मगर कुछ नहीं, वो मेरी भी मां ही तो हैं।
मगर आपके परिवार को असुविधा होगी।
अब बहाने मत बनाइए। हमारी बेटी और श्रीमती जी भी यही चाहती हैं। उन्हें भी थोड़ा कम्पनी मिल जायेगी और मां जी का मन भी लगा रहेगा। बिटिया को भी दादी और श्रीमती जी को सासू माँ का सुख मिल जायेगा।
तब तक मेरी बेटी भागकर माँ की ऊँगली पकड़ कर उनके कमरे से निकालने के दौड़ पड़ी।
भाई साहब की नम आँँखों में बिटिया के प्रति प्यार का सागर उमड़ आया, तभी मेरी श्रीमती जी खुद बाहर आकर माँ जी को सहारा देकर अंदर ले जाते देख जो अहसास हुआ।उसका वर्णन करना संभव नहीं है।
भाई साहब के चेहरे पर संतोष का भाव देख मुझे आत्म संतोष सा हो रहा था।

 

*सुधीर श्रीवास्तव

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