गीत/नवगीत

बार -बार उस ओर

बार – बार उस ओर लौटता,
जिससे बाहर आया है।
प्रत्यावर्तन की अति अद्भुत,
जीवन की शुभ माया है।।

धन – ऋण का आकर्षण भारी,
करता है आह्वान सदा।
साज सृजन का चलता प्रतिपल,
रुकता नहीं विकास कदा।।
मानव, पशु, पक्षी, खगदल में,
शुचि आकर्षण छाया है।
बार – बार उस ओर लौटता,
जिससे बाहर आया है।।

सुमन पहनते रंग – बिरंगे,
मह – मह महक रहे परिधान।
कीट – पतंगों के मिस लेते,
मादा पुष्प पराग विहान।।
फल के अंदर बीज पनपते,
ऋतु ने रंग दिखाया है।
बार – बार उस ओर लौटता,
जिससे बाहर आया है।।

मेढक , मोर सुहाने नर हैं,
देखें मुरगे की कलगी।
पास खिंची आती है मादा,
चपल मोरनी या मुरगी।।
मेढक, मोर, मरद मुरगे ने,
अपना नेह लुटाया है।
बार – बार उस ओर लौटता,
जिससे बाहर आया है।।

मानव की विपरीत रीत है,
नर , नारी पर मरता है।
प्यार बरसता है लुक – छिपकर,
बहि दर्शन से डरता है।।
रंग सभ्यता के में रँग कर,
कामिनि पर हरषाया है।
बार – बार उस ओर लौटता,
जिससे बाहर आया है।।

जन्मद्वार का मोह न मरता,
यौनि बदल कितनी जाएँ।
ऋषि, मुनि, साधु , संत, ज्ञानी भी,
‘मित्र , पराशर बन पाएँ।।
पयपायी, जल, थल या नभचर,
सब में ‘शुभम’ समाया है।
बार – बार उस ओर लौटता ,
जिससे बाहर आया है।

– डॉ. भगवत स्वरूप ‘शुभम’

 

 

🪴 शुभमस्तु !

१६.१२.२०२१◆८.४५ आरोहणं मार्तण्डस्य।

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