कहानी

कहानी – उम्मीद

देश में कोरोना की दूसरी लहर अत्यंत भयावह रूप धारण करती जा रही थी।डबल वेरिएंट वाला वायरस बड़ी निर्ममता व तेजी के साथ लोगों की जीवन लीला समाप्त कर रहा था।इस बार तो उसने बच्चों और युवाओं तक को अपना शिकार बनाने में कोई परहेज नहीं किया।प्रशासन का ढुलमुल रवैया और आम जनता की लापरवाही के कारण संक्रमण और मौत के आंकड़े तेजी से बढ़ रहे थे।महाराष्ट्र और दिल्ली जैसे महानगरों में तो इसने मानो कहर बरपाया हुआ था।
पिछली दिसंबर में ही सरोज का विवाह उसके पापा के मित्र के बेटे राजन के साथ संपन्न हुआ था।सौम्य स्वभाव का राजन पेशे से डॉक्टर था।सरोज उसे जीवन साथी के रूप में पाकर बहुत खुश थी।सास ससुर के रूप में जैसे उसे दूसरे माता पिता मिल गए थे।सरोज की मां का देहांत उसके जन्म के समय ही हो गया था।यद्यपि पापा ने उसे कभी मां की कमी महसूस नहीं होने दी थी किंतु मां का वास्तविक दुलार उसे अपनी सास से ही मिला।अब वह खुद भी मां बनने जा रही थी। सरोज के पिता भी उसे सुखी देखकर निश्चिंत थे।सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था कि तभी फरवरी माह में कोरोना की दूसरी लहर ने इतनी तेजी से तबाही मचानी शुरू कर दी कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई।राजन की ड्यूटी गंभीर रूप से ग्रस्त कोरोना रोगियों के वार्ड में लगी थी।वह जी जान से अपना कर्तव्य निभाने में लगा हुआ था।यहां तक कि वह अपने खाने पीने पर भी ध्यान नहीं देता था।पिछले तीन दिनों से तो वह घर भी नहीं जा सका था।सरोज को परेशान देखकर उसकी सास उसे समझाती कि तुम उसकी चिंता मत करो।वह पुण्य कर्म में लगा है,भगवान उसकी रक्षा करेंगे।तुम अपने आने वाले बच्चे के बारे में सोचो और खुश रहा करो।सरोज यह अच्छी तरह जानती थी कि वास्तव में वे भी राजन को लेकर चिंतित रहती थीं।
राजन के पापा ने रिमोट का बटन दबाया। टी वी पर ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही थी कि दिल्ली के एम्स में पदस्थ डॉक्टर राजन के फेफड़े बुरी तरह प्रभावित हैं और उन्हें इमरजेंसी में एयरलिफ्ट द्वारा हैदराबाद ले जाया जा रहा है।वे चकराकर सोफे पर बैठ गए।वे कुछ कहते इससे पहले ही उनके कानों में अपनी पत्नी के शब्द सुनाई पड़े, “अजी सुनते हो! जल्दी से गाड़ी निकालो।बहू को अस्पताल ले जाना है।”बड़ी असमंजस की स्थिति थी।उन्होंने मन ही मन अपने बेटे की सलामती के लिए ईश्वर से प्रार्थना की और बहू को अस्पताल ले गए। राजन की तबीयत के बारे में अपनी पत्नी और बहू से कुछ नहीं बताया।उन्हें उम्मीद थी कि उनके बेटे ने जिस सेवा भाव से अपनी जान की बाजी लगाई है भगवान उसके साथ कुछ बुरा नहीं होने देंगे।शाम तक खबर आई कि समय पर इलाज मिलने और दृढ़ इच्छा शक्ति से राजन की हालत में तेजी से सुधार हो रहा है।मौका पाकर उन्होंने यह बात अपनी पत्नी से भी बता दी और सख्त हिदायत भी दी कि बहू को इस मामले में कोई भनक न हो।वास्तविकता तो यह थी कि सरोज को राजन के बारे में सुबह ही उसके सहयोगी ने फोन पर यह सूचना दे दी थी।मम्मी पापा को पता न चले वह इसी चिंता में थी।उम्मीद का दीपक उसने भी जलाए रखा था।  सरोज ने बेटे को जन्म दिया।बच्चे के आगमन से सब खुश थे लेकिन राजन के बिना यह खुशी अधूरी थी।
आज लगभग एक पखवाड़े के बाद राजन पूरी तरह स्वस्थ होकर घर लौटकर आ रहा था।सभी के चेहरे आनंदित थे। ईश्वर ने उनकी उम्मीद को टूटने जो नहीं दिया था।

–:कल्पना सिंह

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