सामाजिक

अन्तस् की आवाज

जब भी अन्तस् अतीत की कल्पनाओं की उस रंगमयी गुलजार गलियों से गुजरता है जिसको एकांत व तनाव भरे इस नए व वर्तमान जगह और बेरस मौसम ने पीछे छोड़ दिये है। अन्तस् में एक टिस पैदा होती है कि कैसे इस अड़ियल व नीरस सा मेहमान को दिल के गेह में बुला बैठा जो लाख जाने की गुजारिश करने के बाद भी जाने की रजामंदी नही जताता। अतीत की गलियाँ मक्कड़ी की जाल जैसी होती है। इनमें प्रवेश करना जितना सुलभ होता है,निकलना उतना ही ज्यादा दुर्लभ होता है।
जब इंसान ज़िन्दगी के सफर में उलझे हुए विषयवस्तु को सुलझाने के चक्कर मे और उलझता जाता है तो क्या बसन्त क्या सावन सब के सब मौसम पतझड़ जैसा ही लगने लगता है। हर इंसान चाहता है कि उसकी ज़िन्दगी रूपी कहानी का हर एक पन्ना खूबसूरत हो,पर हर इंसान के किरदार के नसीब में यह कहाँ होता।
इंसान की ज़िन्दगी रहस्यमयी बन जाती है बाहर से दिखता कुछ और है पर अंदर कुछ और ही फ़िल्म चल रहा होता है। बाहर से देखने मे सदा बसन्त के मौसम सा खिला खिला पर अंदर तो सदा पतझड़ का ही मौसम चल रहा होता है।
इन दो परस्पर विरोधाभासी अवस्थाओं के बीच की खाई को पाटने की अन्तस् की कोशिश धरा की धरा रह जाती है।
यहाँ सब चीजें इंसान के अनुसार नही चलती है और चलनी भी नही चाहिए, नही तो इंसान, इंसान नही रह जाता। बाल्यावस्था मे हर इंसान को तरुणावस्था से असीम सँभावना रहती है। बाल्यावस्था ख़्वाब बुनने की उम्र होती है जिसमे इंसान का अंतर्मन खूब सारी अवधारणाओं को जन्म देता है। तरुणावस्था सारे ख़्वाबो को मुक्कमल करने के बोझ को लेकर चलता है।
पर ये मानव जीवन है भईया जो गणित नही बल्कि फिजिक्स के सिद्धांत पर चलता है।
जहाँ अवधारणाओं का बनना,बिगड़ना लगा रहता है। यहां भूत में भविष्य के लिए बनाई गई सभी अवधारणाएं सही साबित नही हो पाती। कुछ अवधारणाएं अपने पैमाने पर सही साबित होती है तो कुछ अवधारणाएं उस पैमाने से हटकर अलग लीक पर चलने लगती है। कुछ अवधारणाएं या परिकल्पनाएं तो इस कदर टूटती है कि वो इंसान को भी बुरी तरह से तोड़ देती है। जहाँ से इंसान बड़ी मुश्किल से ही पनप पाता है।
चूंकि इंसान को पृथ्वी का सबसे बुद्धिजीवी प्राणी कहा गया है क्योकि इंसान चंचल चित वाला होता है। इनके दिमाग मे सदैव किसी न किसी अवधारणा का पुनर्जन्म होता रहता है।
इस संसार में अगर किसी के पास सबसे ज्यादा घुमक्कड़ी प्रवृति है तो वो है इंसान का दिमाग। इंसान का दिमाग कभी शांत नही रह सकता। हमेशा कही ना कही भ्रमण पर निकला ही रहता है। इंसान के दिमाग के भ्रमण करने की गति पृथ्वी की घूर्णन गति से भी ज्यादा होती है। कितना अल्प समय मे यह विचारों के उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव पर पहुँच जाता है इसका आकलन नही कर सकते।
तन्हा व एकांतवास में रहने वाले इंसान के दिमाग का तो पूछिये ही मत! इनका दिमाग भूत व भविष्य में बिचरण करने में इतना तलीन रहता है कि वर्तमान में बिचरण करने की इनको फुर्सत ही नही मिलती । इंसान के सारे दुःखों का जड़ इंसानी दिमाग का ज्यादा बिचरण करना है। जितना सुखी वर्तमान में जीने वाला इंसान होता है उतना भूत व भविष्य में जीने वाला व्यक्ति नही होता।
अतः कहने का मतलब यह है कि बेचारे दिमाग को ज्यादा बेफिजूल का मत दौड़ाइये। भूत व भविष्य की चिंता छोड़ ज्यादा से ज्यादा वर्तमान में जीने की कोशिश करिये और सदा निरोग व प्रसन्नचित रहिये।
— आशुतोष यादव