कविता

हे! नववर्ष

हे! नववर्ष
क्या साथ लाए हो अपने?
ढ़ेरों खुशियाँ
उपहार, उमंग, अच्छाइयाँ,
गर नहीं
तो मैं नहीं कहूँगा नववर्ष
न ही करुँगा स्वागत
बेवजह ही
मैं बस पढ़ता रहूँगा
पुराने वर्ष की अथक कथाएँ
कई महीनों तक
आज की
कल की
पल पल की|

अशोक बाबू माहौर