मुक्तक/दोहा

एक खत

फौजी की पत्नी का प्रथम खत
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प्रिय देखा था न्यूज में ,मचा हुआ कोहराम
धरती का जो स्वर्ग था,बिल्कुल हुआ तमाम |

बेबस हूँ असहाय हूँ , कष्ट नहीं मन लेश
प्रिय तुम हो रण बांकुरे ,मेटो सकल कलेश|

चहूँ दिश अत्याचार है ,मचता हाहाकार |
जन्नत की घाटी मेरी ,करती आर्त पुकार ||

सुनो सजन माँ भी यही ,देती है आदेश
पी.ओ.के ला दे मुझे ,कुछ न रहे अशेष ||

ये जो पत्थर फेंकते, सहना बस सौ वार
सौ के ऊपर एक हो , देना सबको मार ||

अंतिम कहती बात हूँ कभी लिखा न पत्र |
रखना खत की लाज तुम,आन उठा अब शस्त्र ||

वीर प्रसूता मातु की , वीर तुम्हे है आन ।
कुमकुम के गौरव मेरे, भारत माँ की शान ।।

मंजूषा श्रीवास्तव’मृदुल’ (मौलिक )

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