गीतिका/ग़ज़ल

दोषी अब भगवान हुआ है

मतलब का इंसान हुआ है, इतना सा अभिमान हुआ है।
बेदर्दी है दिल का इतना, अपनों से शैतान हुआ है।

समझे ना है पीर पराई, इतना वो हैवान हुआ है।
मात पिता का सब से प्यारा, लेने उन की जान हुआ है।

कितनी बदली सोच हमारी, मानव खुद में शान हुआ है।
थोप रहें हैं पाप खुदा पर, दोषी अब भगवान हुआ है।

मानवता के ओढ़ मुखौटे, गिरगिट सा इंसान हुआ है।
अब तो रही जमीर नहीं है, गली गली बदनाम हुआ है।

देख कर्म मनुज का घिनौना, जीव जन्तु हैरान हुआ है।
जानवर से बदतर हिंसक,मानव खुद पहचान हुआ है।

— शिव सन्याल