संस्मरण

संस्मरण

कई बरस पहले देहरादून जाने पर जब मैं डॉ बुद्धि नाथ मिश्र के घर मिलने गई तो उन्होंने अपने एक प्रवासी मित्र सुरेन्द्र नाथ तिवारी की पुस्तक ‘उठो पार्थ गाण्डीव सम्भालो’ मुझे दी। मेरा तब तक प्रवासी साहित्य या साहित्यकारों से कोई परिचय नहीं था। बहुत उत्सुकता हुई कि देखें ये प्रवासी लोग क्या लिखते हैं, देहरादून से लौटते हुए रास्ते में ही पूरी पढ़ डाली।
इस संग्रह की पहली कविता ही पुस्तक की शीर्ष कविता है, गीता का संदेश है। जब पुस्तक पढ़ी, तब इस पर कुछ लिखने की शायद हिम्मत नहीं हुई या ऐसी किसी कल्पना ने जन्म ही नहीं लिया, परन्तु आज मन हुआ तो पुस्तक दोबारा निकाल लाई अल्मारी से। यह कविता अथवा यों कहा जाए कि गीता, आज भी उतनी ही सार्थक है जितनी हजारों वर्ष पहले थी। आज वह कविता आपके सामने रखने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही हूँ।
उठो पार्थ गाण्डीव सम्भालो, दूर करो अपनी दुविधा
युद्ध धर्म है, युद्ध कर्म है, मात्र शेष यदि युद्ध-विद्या
अनुनय के शब्दों ने तुमको, पाँच ग्राम भी नहीं दिया
जाने क्या विपदायें जेलो
झेलीं, जाने क्या-क्या ज़हर पिया।
पूछते हो धर्म है क्या, हनन अपने बाँधवों का
प्रिय पितामह भीष्म का और निज गुरु द्रौण का

जानता हूँ मैं तुम्हारा मोह ये कौंतेय
किन्तु सोचो,
धर्म के इस मोह ने है क्या दिया तुमको?
भीष्म की इस प्रतिज्ञा ने क्या दिया तुमको?
धर्म के कारण लुटी थी द्रोपदी भी
धर्म के कारण लगी थी आग लाक्षागार में
भीष्म प्रण से ही बंधा अंधा, अयोग्य लालची,
धृतराष्ट्र राजा इस महान देश का।
पार्थ।
प्रतीज्ञाओं के बहाने,
धर्म के झूठे मुखौटे
पहनकर हमने लुटाई है प्रतिष्ठा देश की।
और समझौते समझ हम,
क्लीव-से बैठे रहे
देखते लुटती हुई अपनी प्रतिष्ठा देश की।
कविता लम्बी है, पर आज भी क्या हम क्लीव बने बैठे देश की प्रतिष्ठा लुटती नहीं देख रहे?

— आशा शैली

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