गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

कोई उम्मीद मेरे दिल में फिर पलने लगी है
मुझे लगता है मेरी दाल अब गलने लगी है

अरे कम्बख़्त टैलीफोन चुप रह जा ज़रा तो
तवे की इस तरह रोटी मिरी जलने लगी है

मुझे लगता है मेरा घर किसी दफ्तर सरीखा
मिरी अर्ज़ी ज़रूरी है मगर टलने लगी है

ये मौसम सर्द, ये माहौल गर्माती रज़ाई
तुम्हारी आँख को क्यों बेवजह खलने लगी है

बड़े ही बे सलीक़ा हो जो कहते हो नहा लो
कोई अच्छी घड़ी है जो कि बस टलने लगी है

जो हमने गर्म पी ली चाय तो तुझको हुआ क्या
कहाँ की दाल सीने पर तिरे दलने लगी है