धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

सोचने वाली बात

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरा
गुरुर्साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः

गुरु ही सब कुछ है।दुनिया में हर क्षेत्र में, कहीं भी सफलता पानी हो,एक अच्छे मार्गदर्शक की जरूरत होती है।कई बार गुरु हमें मनुष्य रूप में मिलते  हैं तो कई बार किसी और रूप में।

हर मनुष्य को एक गुरु तो वरदान रूप में प्राप्त ही है अगर हम महसूस कर सकें और वो है प्रकृति।प्रकृति का हर एक कण निरन्तर हमें शिक्षा देता रहता है।नदी चलते रहने की, पर्वत दृढ़ता की ,धरती धैर्य की, पेड़ पौधे परोपकार की । प्रकृति का कोई भी हिस्सा हो, वो अनगिनत सीखों से भरा पड़ा है।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि हम अपने स्वार्थों के पीछे भागकर जाने कितने ज़ख्म प्रकृति को देते चले आये हैं और फिर भी जब हम चिरनिद्रा में लीन हो जाते हैं तो लाखों करोड़ों रुपये कमाकर, बनाये हुए आलीशान घर का कोई भी लक्ज़री रूम हमें पनाह नहीं दे पाता,तब हमें प्रकृति की गोद ही पनाह देती है।हम उसी में लीन होते हैं जहाँ से हमारा जन्म हुआ था।सारे नाते-रिश्ते हमारी देह तक सीमित हैं।देह खत्म,रिश्ते खत्म।यही सच्चा रिश्ता साबित होता है लेकिन जब तक हम जीते हैं हमारा रिश्ता शायद प्रकृति से ही सबसे कमजोर होता है। कभी कोई गेट टुगेदर नहीं करते।कोई समारोह नहीं आयोजित करते।जो भी समारोह हम अपने जीवन में करते हैं सिर्फ और सिर्फ उससे प्रकृति को चोट ही पँहुचाते हैं।लेकिन माँ प्रकृति हमसे इतना गहरा तादात्म्य रखती है कि वह कभी हमें अपनाने से इनकार नहीं करती।है न सोचने वाली बात?

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