कविता

गृहणी

आप क्या करती हैं?
बहुत ही सकुचाते हुए कहा
कुछ नहीं बस गृहणी हूं|
 तो आज तय करते हैं
क्या सचमुच गृहणी कुछ नहीं करती
हमारी सुबह तो 7:00 बजे के बाद होती है
पर वह 7:00 बजे नहा कर पूजा कर
सबके लिए बेड टी लाती है
हम सब की शुरुआत
बिस्तर पर चाय से होती है
उसकी हम सबको खुशी खुशी
चाय देकर होती है
सचमुच वो  गृहणी है
बाहर काम नहीं करती
पर ऐसा सब कुछ करती है
जिससे हमारे चेहरे पर हो हंसी
खाना बनाना सब की फरमाइश का
सब देखते  तमाशा उसके आजमाइश का
चूड़ी बिंदी महावर सिंदूर सबका  रखती ध्यान
फिर भी उसने बना दिया घर जो था मकान
अपनी पायल की रुनझुन में
अब क्या करना है उसके सपने बुनती है
हां वह गृहणी है बाहर काम नहीं करती
सब की दवाई टिफिन चाय नाश्ता खाना
इसको ही मानती वो अमूल्य नजराना
फिर शाम को घर आकर कहता
आज बहुत काम था काफी थक गया हूं
वो  हंसकर बैग लेकर कहती
फ्रेश हो जाओ कड़क चाय पिलाती हूं.
 घर को व्यवस्थित करती है
मगर वह गृहणी  है बाहर काम नहीं करती
परंतु क्या वह सिर्फ ग्रहणी है?
इस घर स्वरूप  कारखाना का
हर काम उसके हाथों ही होता है
वह एक अकाउंट ऑफिसर
एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर टीचर डॉक्टर
आल इन वन है इस पैकेज में बिना तनख्वाह के
वह गृहणी है, अनमोल है, दानवीर क्षमाशील,
 वह मात्र ग्रहणी नहीं संचालिका है घर की
देश के बच्चों के आने वाले भविष्य की.
नमन है उन्हें
— सविता सिंह मीरा