कविता

यादें

हर वक़्त किसी की याद मुझे
आती ही रही आती ही रही।
मन उसमें ही बस रमा हुआ
यादें उसकी तड़पाती रहीं।
कई बार जतन किये लाख मगर
क़ोई भी नतीजा मिला नहीं।
मन जहाँ लगा बस अड़ा रहा
पागल थोड़ा भी हिला नहीं।
जाने को नहीं तैयार हुईं
लहरों जैसी बल खाती रहीं।
आने वाले तुम ही करते
कुछ ऐसा कि हम भूल सकें।
हम तो उपाय करके हमदम
विरही अपने से देख थके।
हँस के इन्कार किया तूने
वह अदा हमें भाती ही रही।
— वीरेन्द्र मिश्र ‘विरही’