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विज्ञान कथा – अपना ‘सूरज’

मजरूह सुलतानपुरी ने जब जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली फिल्म के लिए गीत – ‘तारों में सजके अपने सूरज से, देखो धरती चली मिलने’ लिखा होगा, तब सम्भवतः उन्हें ख्याल भी नहीं आया होगा, कि किसी गांव को अपना ‘सूरज’ भी मिल सकता है! लेकिन ऐसा होकर रहा. उत्तरी इटली में पाइमोंट घाटी के विगनेला नामक गांव ने यह कर दिखाया है।

सोमेन की तरह विगनेला नाम का गांव का हर निवासी आज बहुत प्रसन्न था. गांव ने अपना ‘सूरज’ जो बना लिया था. सर्दियों के दौरान अब धूप की कमी नहीं सताएगी.’ सोमेन सोच रहा था.
”हम कितने परेशान थे. गांव को सर्दियों (नंवबर और फरवरी) में 83 दिनों तक धूप नहीं मिलती. हमारा गांव एक गहरी घाटी के तल पर जो स्थित है.” उसकी सोच जारी थी.
”डिप्टी मेयर पियर फ्रांको मिडाली न केवल डिप्टी मेयर हैं, एक अच्छे इंसान भी हैं और समझदार भी. गांव को इस मुश्किल से निजात दिलानी ही होगी, सर्दियों में गांव में धूप लानी ही होगी, उनका दृढ़ निश्चय था.” सोमेन हर्षित था.
”मिडाली ने पहाड़ की चोटी पर एक विशाल शीशा (कृत्रिम सूरज) शहर के चौक पर लगाया.” सोमेन बहुत खुश था.
”यही विशाल शीशा हमारे लिए कृत्रिम सूरज बन गया है. सूरज की रोशनी इसी शीशे से प्रतिबिंबित होकर गांव तक पहुंचती है. इस आर्टिफिशियल सूरज से करीब 6 घंटे हमें रोशनी मिलती है.” सोमेन के आनंद की सीमा नहीं थी.
”इस रोशनी की वजह से ही हम लोग सर्दियों में घर से बाहर निकलकर एक-दूसरे से मिलते और साथ बैठते हैं. धूप का सेवन भी सामाजिक रिश्तों का सिंचन भी!” सोमेन उत्साहित था.
”जिस विशाल शीशे से गांव तक सूरज की रोशनी पहुंचती है, उसका वजन 1.1 टन है. इसे कंप्यूटर की मदद से ऑपरेट किया जाता है. यह मैटीरियल 95 फीसदी सूर्य की रोशनी को परिवर्तित करता है. 1 लाख यूरो वाले इस प्रोजेक्ट से गांव में रहने वाले लगभग 200 लोगों को धूप और रोशनी का उपहार मिला है, जो अन्य किसी उपहार से बेशकीमती है.” सोमेन के चेहरे पर संतुष्टि की आभा नमूदार हो गई थी.
”उत्तरी इटली में पाइमोंट घाटी के विगनेला नामक गांव की जय!
डिप्टी मेयर पियर फ्रांको मिडाली की जय, जिसने गांव को अपने ‘सूरज’ से रोशन किया.” सोमेन के साथ सब लोग जयकारे लगा रहे थे.

2 thoughts on “विज्ञान कथा – अपना ‘सूरज’

  1. बहुत सुंदर संकल्पना। अपना ‘सूरज’ परिवर्तित धूप में अपनों से मिलना, रिश्तों में नेह सिंचन करना। बहुत खूब।आदरणीय लीला दीदी, सादर प्रणाम। सुप्रभात। मकरसंक्रांति के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। सार्थक, प्रेरक लघुकथा के लिए बहुत बहुत बधाई। सादर

  2. मजरूह सुलतानपुरी ने जब जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली फिल्म के लिए गीत – ‘तारों में सजके अपने सूरज से, देखो धरती चली मिलने’ लिखा होगा, तब सम्भवतः उन्हें ख्याल भी नहीं आया होगा, कि किसी गांव को अपना ‘सूरज’ भी मिल सकता है! लेकिन ऐसा होकर रहा.

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