धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

क्या है उलटी प्रतिमा का रहस्य ?

मांगी तुंगी जी दिगम्बर जैन सिद्ध क्षेत्र दक्षिण भारत में जैनों का सबसे मुख्य पवित्र सिद्ध क्षेत्र है। नासिक (महाराष्ट्र) से लगभग 125 किमी दूर तहराबाद के पास स्थित, बीच में पठार के साथ एक प्रमुख जुड़वां शिखर वाली चोटी है। राम और हनुमान ने मंगितुंगी पर्वत से मोक्ष प्राप्त किया। निर्वाणकांड के अनुसार राम, हनुमान, सुग्रीव, सुदीव, गव्य, गवाख्य, नील, महानील और निन्यानबे करोड़ मुनियों ने मंगीतुंगी से मोक्ष प्राप्त किया, जो जैन अनुयायियों के लिए अत्यंत पवित्र पूज्य स्थल है। इसे दक्षिण का सम्मेद शिखर भी कहा जाता है।
इस पर्वत पर एक बलभद्र स्वामी की प्रतिमा चट्टान में उत्कीर्णित है, जिसके सिर्फ पीठ के ही अर्थात् पिछले भाग के ही दर्शन कर सकते हैं। आज तक कोई भी इस प्रतिमा के मुख के दर्शन नहीं कर पाया है। इस प्रतिमा से सम्बंधित बहुत ही रोचक कथा है-
कृष्ण जी के बड़े भाई बलदेव जो की कामदेव थे अर्थात् बेमिसाल सुंदर जो कि लोक में श्रेष्ठ सुंदर हों। बलदेव जी मुनि बनने के बाद जब छह माह तक तप करने के बाद आहार के लिए कंचनपुर ग्राम की ओर निकलते हैं तब रास्ते में कुँए के पनघट पर पानी भरने आयी महिलाओं की नजर जैसे ही बलदेव मुनि पर पड़ती है तो मुनि के मुख-कमल और सौंदर्य को देखकर इतनी मोहित हो जातीं हैं कि वे महिलाएँ अपनी सुध-बुध खो देतीं हैं। जिस रस्सी से कुँए से पानी निकालने हेतु बर्तन को बांधनी थी उस रस्सी से वे अपने ही साथ आये खुद के बच्चों को बाँधने लगीं और बर्तन समझ कर बच्चों को कँुए में धकेलने लगीं।
महिलाओं की इस हरकत को देख कर अंतराय मान कर बलदेव मुनि विचार करते हैं कि धिक्कार है मेरे इस मुख पर और क्षणभंगुर शरीर पर, जिसकी सुंदरता पर ये महिलाएँ इतनी मोहित हो गयी कि अपने खुद के बच्चों को ही भूल गयीं। धिक्कार है इस संसार पर इस शरीर पर जो कि अस्थायी है, क्षणभंगुर है उस पर इतना मोहपन। ओह! आज मेरे इस मुख और शरीर की वजह से कितनी हिंसा हो जाती। इस प्रकार उक्त घटना से बलदेव मुनि को शरीर और संसार के प्रति इतनी गहरी विरक्ति हो जाती है कि वे मांगीतुंगी के पर्वत पर जाकर इसप्रकार बैठ जाते हैं कि मुख पहाड़ की तरफ और पीठ गाँव की तरफ अर्थात् खुले भाग की तरफ जिससे कोई उनका मुख नहीं देख सके। उस विरक्त भाव से उसी स्थान से और उसी मुद्रा से अत्यधिक कठोर तप करते उन्होंने वहीं से आत्म उद्धार किया।
बलदेव स्वामी के आतेद्धार के पश्चात् देवगण उस स्थान पर आकर पूजा करते हैं और वहाँ बलदेव स्वामी की प्रतिमा विराजित करते हैं और वह प्रतिमा जी भी उसी प्रकार विराजित करते हैं जैसे बलदेव मुनि तप करते वक्त बैठे थे। कहते हैं ये वही प्रतिमा है जिसके मुख को आजतक कोई नहीं देख पाया। जब भी प्रतिमा जी के मुख देखने की कोशिश की गयी वो सब विफल रही। यह घटना इस प्रतिमा के निकट ही लिखी हुई है।
— डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’

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