कविता

मैं पतंग बन जाऊं

मेरा मन है
कि
मैं पतंग बन जाऊं
मकर संक्रान्ति और पतंगोत्सव की
पावन वेला पर
सूर्यदेवता की साक्षी में
पतंग की तरह
नील गगन की नीलिमा में लहराऊं
मैं पतंग बनूं
शांति की
सौहार्द की
सद्भाव की
इंसानियत की
प्रेम की
निर्मल आनंद की
परोपकार की
अतिथि के सत्कार की
खुशियों के संचार की
महिलाओं के सम्मान की
देश की ऊंची-उज्ज्वल शान की
महंगाई के उपचार की
भ्रष्टाचार के संहार की
भेदभाव के उन्मूलन की
सत्पथ के दिग्दर्शन की
और
सब तक यह संदेश पहुंचाऊं
कि
कैसे मानव जीवन की लाज बचेगी
कैसे इंसान की इंसनियत ज़िंदा रहेगी
मेरा मन है
कि
मैं पतंग बन जाऊं
मकर संक्रान्ति और पतंगोत्सव की
पावन वेला पर
सूर्यदेवता की साक्षी में
पतंग की तरह
नील गगन की नीलिमा में लहराऊं.

3 thoughts on “मैं पतंग बन जाऊं

  1. आदरणीय लीला दीदी, सादर प्रणाम।
    मैं पतंग बनूं
    शांति की
    सौहार्द की
    सद्भाव की
    इंसानियत की
    प्रेम की
    निर्मल आनंद की
    परोपकार की। बहुत सुन्दर
    उड़ती जाए नील गगन में पतंग,
    सपने सजाती, मन में ले उमंग।
    रंगबिरंगी आशाएं, खिलाती नवरंग,
    स्नेह डोर से जुड़ी रहे पतंग।
    सादर

    1. यह आपकी जर्रानवाजी है. हम निःशब्द हैं.

  2. आज मकर संक्रांति का पावन पर्व है. आप सबको मकर संक्रांति पर्व की कोटिशः बधाइयां और शुभकामनाएं. सूर्य का एक नाम पतंग भी है. इसलिए मकर संक्रांति को पतंग उड़ाकर सूर्य की तरह आसमान की ऊंचाइयों को छूने की कोशिश की जाती है. अगर हम खुद ही पतंग बन जाएं, तो भगवान सूर्य देव की पूजा स्वतः ही हो जाएगी. इसलिए प्रस्तुत की है इस पर्व पर एक छोटी-सी कविता.

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