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सबसे बड़ी दिक्कत

“मास्क तो
एक प्रतीक मात्र है !
दरअसल संसार की
सम्पूर्ण मानवजाति
प्रकृति को
मुँह दिखाने के
काबिल ही नहीं हैं !
×××
चीन की चालों का
जवाब है
दलाई लामा !
तिब्बत को
स्वतंत्र कराया जाय
और दलाई लामा को
मिले
भारतरत्न !”

एक गम्भीर व्यक्ति (लव इन डार्विन के महत्वपूर्ण पात्र) व मेरे बिंदास मित्र तथा उपन्यासकार ‘बनफूल’ के अंतेवासी ‘आशीष’ भाई के पास मेरी संतान (दोनों किताब); इसे उनके द्वारा मेरे एक और सदाबहार मित्र व डॉक्टर भाई को सादर हस्तांतरित की जा रही है!

हमें हिंदी का ‘लिंग’ से बचाइए ! वैसे लिंग अच्छी चीज नहीं है या तो यह जनसंख्या बढ़ाती है या मुआ ‘डाउन फ्लोर’ में रहकर भी ‘बलात्कार’ के बारे में ही सोचता है ! हिंदी भाषा को ही लीजिए, कामता प्रसाद गुरु से अबतक के सभी वरेण्य व्याकरणाचार्यों ने हिंदी के ‘लिंग’ निर्धारण के लिए जो नियम तय किये हैं, वह एक या दो नहीं, कई हैं, जिसे किसी भी दृष्टिकोण से रटा नहीं जा सकता !

सबसे बड़ी दिक्कत तब पेश आती है, जब सभी नियमों के साथ ‘अपवाद’ आकर माथा-पच्ची करने लग जाते हैं ! इसके बावजूद हिंदी में शब्दों के लिंग निर्धारण का कोई एक या सटीक नियम नहीं है । उदाहरणत:, एक नियम कहता है कि नारीसुलभ चेष्टाएँ स्त्रीलिंग होंगी, तो पुरुषोचित गुण या चेष्टाएँ पुल्लिंग। जैसे:- अंगड़ाई, हंसी, मुस्कान, लज्जा इत्यादि स्त्रीलिंग शब्द हैं, जबकि साहस, क्रोध, ठहाका इत्यादि पुल्लिंग हैं, लेकिन फिर ‘क्रूरता’, ‘निर्दयता’ शब्द स्त्रीलिंग क्यों हैं ?

इतना ही नहीं, ‘पुलिस’ और ‘मूंछ’ भी स्त्रीलिंग हैं ! अतएव, बेहतर यही है कि सतर्क रहकर अभ्यास किया जाय ! एक आम फ़हम नियमित अभ्यास नहीं कर पाएंगे, फिर तो केंद्रीय हिंदी संस्थान, जेएनयू और साहित्य अकादेमी को इसपर निश्चितश: चिंतन और विमर्श करने ही चाहिए, जिसके लिए वे समय और रुपये बर्बाद करते आये हैं !