गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल – चिड़िया किधर गई

शाम सवेरे आती थी वह चिड़िया किधर गई।
गीत खुशी के गाती थी वह चिड़िया किधर गई।
गहरा अपनत्त्व बना कर शोखी नखरा नियंता,
रिश्ते क्या? समझाती थी, वह चिड़िया किधर गई।
ना जाने क्या रिश्ता था उनकी ममता भीतर,
दूर रहे तड़पाती थी वह चिड़िया किधर गई।
एक कटोरी पानी पी कर अभिवादन करती,
शुभ आशीषें पाती थी वह चिड़िया किधर गई।
फुदक-फुदक कर चहक-चहक कर उन्मुक्त कलोल,
बारिश बीच नहाती थी वह चिड़िया किधर गई।
कच्चे घर की नुक्कड़ों में भव्य घोंसले बुनती,
सुख की निंद्रा पाती थी वह चिड़िया किधर गई।
भव्य अर्ध आकार बना कर झुण्ड में उड़-उड़ कर,
गीत इलाही गाती थी वह चिड़िया किधर गई।
घर की बेटी जैसी अपनी अभिलाषा लेकर,
घर में आती जाती थी वह चिड़िया किधर गई।
अनुशासित पंगति में उड़ती लहरों की भांति,
एकांकी बिम्ब बनाती थी वह चिड़िया किधर गई।
नित्य की भांति समय पर अगर ना आती तो,
दिल का चैन चुराती थी वह चिड़िया किधर गई।
दाना-दाना चोंच से चुग कर बच्चों को खिलाती,
सहृदय फर्ज़ निभाती थी वह चिड़िया किधर गई।
जन्नत की परिभाषा देवे उल्टबाजी में,
सुन्दर दृश्य बनाती थी वह चिड़िया किधर गई।
चूं-चूं, चीं-चीं की लय पर सूरज नित्य ही निकले,
नित्त्य सुबह जगाती थी वह चिड़िया किधर गई।
‘बालम’ मालिक के जीवन को भी महसूस करे,
दुख-सुख दर्द बंटाती थी वह चिड़िया किधर गई।

— बलविन्दर ‘बालम’ 

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