कविता

अधूरा इश्क़

अधूरा इश्क़
एक लंबे इंतज़ार के बाद,
फिर से वही इंतज़ार का आलम…
ना ख़्वाब ही पूरे हुए
ना नींद ही मुक्कमल हुयी,
दिल तड़पता हर आह में
फिर भी होता है पूरा -पूरा
ये अधूरा इश्क़… ये अधूरा इश्क़

अधूरा इश्क़
देता तूफान में ताकत
अंधेरे में एक रोशनी पुंज
पृथ्वी के एक छौर तक जाने
ओ आने की शक्ति
जीती हरपल तुझे प्रतिपल
फिर भी तड़पाता पल- पल
ये अधूरा इश्क़… ये अधूरा इश्क़

अधूरा इश्क़
एक तारे की तरह चमकता,
मुझे खुशी और आनंद से भरता,,
और बढ़ती ज़िन्दगी की रंगीनियाँ…
अचानक आ पड़ती हैं
यथार्थ के धरातल पर
होता फिर लहूलुहान
ये अधूरा इश्क़… ये अधूरा इश्क़

अधूरा इश्क़
है अजब दास्ताँ कशमकश की
मुहब्बत की रौशनी में,
हम जी रहे हैं, तेरे बगैर भी
क़यामत से पहले ये तो बताना
तेरे नए घर का पता क्या है
हो रोज-ए-क़यामत ही पूरा
ये अधूरा इश्क़… ये अधूरा इश्क़

— चन्द्रकांता सिवाल “चन्द्रेश”