लघुकथा

उलझन

सुनैना अलमारी में रखे कपड़े को तह लगा रही थी बाहर तेज बारिश भी हो रही थी बेटा निखिल लैपटॉप पर पढाई कर रहा था। तभी फोन की घण्टी बजी… सुनैना ने पहली रिंग में ही उठा ली
हाय! सुनैना कैसी है यार उधर से आवाज आई….
तुम कौन?? पहचानी नहीं ओह, यार तू मेरा नंबर सेव् नहीं की अबतक ??
हद है यार मैं रिदिमा !
ओह सॉरी यार फोन रिसेट होने से नंबर इघर-उधर हो गए….सुनैना ने कहा
चल ठीक है और बता कैसा चल रहा… काफी दिनों से तुझसे बात नहीं हुई, इसलिए सोचा आज तुझसे बात करूं।
रिदिमा सुनैना की बातें एक धार में बहने लगी दोनों सहेलियां आपस में यूं बातें करने लगे जैसे मौसम की तन्हाई में कोलाहल की ध्वनि गूंज उठी हो ।
सुनैना – यार तेरा तो अच्छा है नौकरी करती है बाहर आना-जाना अपनी मर्जी से डिसीजन लेना, खुश और बिंदास रहना मस्त है तेरी लाइफ…..
हमारा तो डेली का एक ही किस्सा सुबह का नाश्ता दोपहर का खाना शाम के स्नैक्स का सोचना फिर रात का डिनर….इस भागदौड़ में दिन कब निकल जाता है पता ही नहीं चलता।
खैर अपनी ही सुना कुछ नया !
सुनैना अपने मन की इच्छाओं को थामकर, रोककर रिदिमा के जिंदगी उसके स्वत्रंत चाहतों की उड़ान को सुनकर सुकून पाना चाहती थी।
कहीं न कहीं खुश होते हुए भी नाखुश की मायूसी उसे घेरे रहती थी कुछ सपने उम्मीदें जो अपने दम पे पूरे होने को बेताब थे और जिसे परिस्थियों नें मौका नहीं दिया या कह लें किसी ने उसे समझा ही नहीं मन का एक कोना हमेशा तन्हा ही रहा….
रिदिमा और सुनैना कॉलेज फ्रेंड थे दोनों की बातें उस समय जैसा ही होता था। और उस वक्त भी वैसा ही चल रहा था……
नहीं यार, ऐसा नहीं, सुनैना ने यूँ कुछ कहा- तभी कॉल वेल बजी बात करते-करते वह गेट पर पहुँची गेट खोली तबतक दोनों सखियों का संवाद जारी था सुनैना अब अपनी बातों को विराम देना चाहती थी क्योंकि, अभय ऑफिस से आ चुके थे सुनैना जानती थी अभय जब मौजूद होता है तो नहीं चाहता कि किसी फोन पर मैं व्यस्त रहूं।

अच्छा चल यार अब रखती हूं, फिर बात करती हूं चल ठीक हूं वाय….पर नंबर सेव् कर लेना मेरा, रिदिमा ने कहा।
हां ठीक है पक्का कर लुंगी।
फोन रखते ही अभय ने पूछा किसका फोन था ?? अरे वो रिदिमा का…
इतना यार-यार करके बात कर रही थी इतना याराना…. महिलाओं को ऐसा बोलना शोभा नहीं देता। अभय ने वैसे नॉर्मली ही बोला था
पर ये बात सुनैना को टीस कर गई मुस्कुराते चेहरे पर उदासियों उतर आई।
अभय समझ चुका था सुनैना को बुरा लगा उसने कहा अरे यार मजाक में बोला था तुमने तो सीरियस ले लिया।
सुनैना डबडबाई आंखों से सोचने लगी जिस शब्द को अभय रोज अपनी बोलचाल की भाषा में यूज करते हैं उसी शब्द को मेरे द्वारा प्रयोग होने पर मुझे ताना दे गए क्या औरत सर से लेकर पाँव तक भाषा से लेकर व्यवहार तक कहीं भी स्वतंत्र नहीं है?? और इन्हीं सवालों में खुद को घेरे हुए काम में लग गई पर उसका अशांत मन औरत से जुड़े अनेकों सवाल से उलझा रहा।

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