लघुकथा

इच्छा

असलम की बड़ी इच्छा थी कि वह भी नेत्रदान ,देहदान का संकल्प करे।परंतु परिवार और समाज ने उसकी भावनाओं को चकरघिन्नी बना रखा था।तमाम तर्क देकर उसकी इच्छा की पूर्णता में बाधाएं डालते रहे।
समय का फेर देखिये कि पिछले साल आँखों के आपरेशन के बाद हुए इन्फेक्शन के बाद असलम के दोनों आँँखों की रोशनी जाती रही।अब वो अंधा हो चुका था।
तब उसके दोस्त शंकर ने ढाँढस बँधाया और उसके लिए अपनी एक आँख निकलवा कर उसकी अंधेरी जिंंदगी में उजाला कर दिया।
और आज असलम नेत्रदान और देहदान का संकल्प पत्र भरकर बहुत सूकून महसूस कर रहा था।
परंतु आज उसके साथ तर्क से पाँवों में बेंंड़ियाँ बाँधने वाले परिवार, समाज का एक भी शख्स उसके साथ नहीं था।
कोई था तो उसका वही अपना दोस्त शंकर। जिसने बिना किसी सलाह मशवरा के उसकी अंधेरी जिंदगी के दर्द को समझा और अपनी एक आँख देकर उसके जीवन में उजाला कर दिया।
आज अपनी इच्छा का सम्मान कर पाने के लिए उसे अपने दोस्त पर गर्व हो रहा था, जिसकी प्रेरणा से उसकी इच्छा पूर्ण हुई।