कहानी

कहानी –  नन्ही परिचारिका

         रानू का रिपोर्ट पॉजिटिव था।दो दिनों से उसे सर्दी -खांसी थी। ऑफिस में उसकी सहकर्मी को बुखार था। उसी के सम्पर्क में आने से वह कोरोना पॉजिटिव हो गई थी। उसने अपने  को क्वारनटाइन कर लिया था। उसकी बारह बरस की बेटी निगेटिव थी। यह जानकर उसने राहत की सांस ली थी और भगवान का शुक्रिया भी अदा किया था।
           अब उसकी  परीक्षा की घड़ी थी। उसकी कुक और काम वाली बाई ने घर आना बंद कर दिया। नगर निगम वालो ने कोविड पॉजिटिव का  पर्चा घर में  चिपका दिया था। अब तो दूध सब्जी वालों ने भी उसके दरवाजे से मुख मोड़ लिया था।अब तो घर की जिम्मेदारी उसकी नन्हीं  सी बेटी सोनी पर आ पड़ी थी। ये अच्छा था कि पिछले साल  कोरोना के लॉक डाउन में वह रानू के साथ मिलकर घर का काम शौक -शौक में किया करती थी तो कुछ काम वह करना सीख गई थी।
             सोनी ने अब माँ की भूमिका सम्भाल ली थी।वह सुबह जल्दी उठ जाती।अपनी मम्मी के लिए काढ़ा बनाती ।उनके लिए गरम पानी करके देती।मम्मी से फोन पर दलिया बनाने की विधि पूछ जैसे- तैसे बनाती और मम्मी के कमरे में मास्क लगा कर रख आती।
       एक  उसके मामा जी ही थे जो उनकी चिंता करते थे। मामा जी ने मोबाइल  पर बातें करते हुए सोनी से कहा-“बेटा, तुम चिंता मत करो तुम्हारी मम्मी बड़ी बहादुर है ।वो जल्दी ठीक हो जाएगी ।”यह कहते हुए उन्होंने उसे एक  डॉक्टर का नम्बर दिया और कहा कि जरूरत पड़ने पर  इन्हें फोन कर देना ।
       सोनी पूरे तन-मन से  अपनी मम्मी की सेवा में लगी रही। मामा को बहुत दुःख होता कि वह फूल सी बच्ची  बर्तन धोना, खाना पकाना जैसे काम कर रही है। वे उसे सावधानी बरतने की सलाह देते।उनका मन कचोटता कि बिन बाप की बच्ची ने बचपन से दुःख झेला है पर इस समय वे उनकी कुछ सहायता नहीं कर पा रहे हैं।वे इस समय उनसे कई कोसों दूर अन्य शहर में हैं।
         सोनी फोन पर डॉक्टर से बातें करती।डॉक्टर उसे मरीज का टेंपरेचर, ऑक्सीजन लेबल और पल्स  रेट प्रतिदिन पूछते।वह मम्मी से पूछ कर प्रतिदिन डॉक्टर को बताती। डॉक्टर मयंक को बच्ची की आवाज में एक गजब का आकर्षण लगता।
          उस दिन डॉक्टर मयंक ने पूछ ही  लिया-“बेटा, तुम्हारे यहां तुमसे कोई और बड़ा आदमी नहीं है?”
      सोनी ने उदासी भरे स्वर से कहा-” नहीं अंकल, कोई नहीं है।घर में मैं और मेरी मम्मी ही रहते हैं।”
    ” और तुम्हारे पापा?”डॉक्टर मयंक तपाक से पूछ बैठे।
      “मेरे पापा मेरे जन्म के कुछ महीने पश्चात नहीं रहे अंकल।”
       सोनी ने रुआंसे स्वर से कहा।
       डॉक्टर मयंक को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने कहा-“ओह!सॉरी, कोई बात नहीं बेटा, तुम तो बड़ी होशियार हो। तुम मम्मी की देखभाल अच्छी तरह कर सकती हो। देखो ज्यादा बुखार आने पर तुम मम्मी को पैरासिटामोल दे देना।”यह कहते हुए डॉक्टर मयंक ने फोन काट दिया।
      पता नहीं उस बच्ची की बात सुनकर डॉक्टर मयंक बेचैन हो उठे। उन्होंने फैसला किया कि कल वे सोनी को वीडियो कॉल  करके उसे जरूर देखेंगे।
      दूसरे दिन उन्होंने सोनी को वीडियो कॉलिंग किया। सोनी ने कॉल रिसीव किया तो डॉक्टर मयंक सोनी को देखकर आश्चर्यचकित रह गए। बिल्कुल वही नाक-नक्श, वही चेहरा।हूबहू वही तो है उसकी बचपन की दोस्त।वैसे ही दिखती है सोनी।
      आज सोनी ने बताया कि उसकी मम्मी  को बहुत बुखार है।टेम्परेचर 102 के ऊपर जा रहा है। आज कोरोना का आठवां दिन है फिर भी बुखार कम नहीं हो रहा है।मम्मी अपने से ही ठंडे पानी की पट्टीयां कर रही हैं फिर भी बुखार उतर नहीं रहा है।
           यह सुनकर डॉक्टर मयंक चिंतित हो उठे। उन्होंने सोनी से कहा-” बेटा, तुम्हारी मम्मी का सिटी स्कैन कराना पड़ेगा।मैं एम्बुलेंस की व्यवस्था करता हूँ।तुम मम्मी को बता दो कि वे तैयार रहें।
        थोड़ी देर में मम्मी  सिटी स्कैन कराने जाने को तैयार हो गईं पर ये क्या डॉक्टर मयंक का फोन आया कि सिटी में कोई भी एम्बुलेंस खाली नहीं है।अब क्या किया जाए?”
       नन्हीं सोनी कुछ समझ नहीं  पा रही थी। उसने डॉक्टर मयंक को फोन पर रोते हुए कहा-डॉक्टर अंकल,अब क्या करें? क्या आप अपनी कार से मेरी मम्मी को नहीं ले जा सकते?”
         पता नहीं सोनी इस आग्रह में ऐसा क्या था कि डॉक्टर मयंक अपने सारे जरूरी एप्पाईमेंट केंसिल करके सोनी की मम्मी को लेने उसके घर का पता पूछते हुए पहुंच गए।
        सोनी डॉक्टर अंकल को देखकर बहुत खुश हो गई। रानू का चेहरा अच्छी तरह मास्क और फेस शील्ड से ढंका हुआ था। डॉक्टर मयंक पी पी ई किट पहन कर आये थे ताकि  संक्रमण न हो । सेनिटाइज करके वे रानू को पास के सिटी स्कैन सेंटर में ले गए।
        रानू को वे पूछ रहे थे-” मैडम, आपको सांस लेने में कोई दिक्कत तो नहीं है?”
       रानू डॉक्टर मयंक की आवाज़ सुनकर चौंक पड़ी। बिल्कुल वही आवाज, वही बोलने  का अंदाज फिर उसने अपना सिर झटक दिया कि ऐसे समय में उसे वह क्यों याद कर रही है।
       उसने कहा-“जी, घुटन सी हो रही है। उसने घुटी-घुटी आवाज में कहा।
       “ओह!अब तो ज्यादा बेस्ट होगा कि आपको घर की बजाय हॉस्पिटल में एडमिट कर दिया जाय।क्या आप अपने साथ आक्सीमीटर रखी हैं तो ऑक्सीजन लेबल कितना है मुझे बताएं।”
       रानू नेआक्सीमीटर से अपना आक्सीजन लेबल चेक किया।उसने डॉक्टर मयंक को अपना ऑक्सीजन लेबल नाइंटी वन बताया।
      यह सुनकर डॉक्टर मयंक ने कहा-ओह! चलिये देर नहीं करते हॉस्पिटल चलते हैं पर आप घबराइये नहीं सब नार्मल ही है।”
      डॉक्टर मयंक ने रानू को अपने हॉस्पिटल में एडमिट कर लिया और सोनी को फोन पर जानकारी देते हुए कहा-“सोनी बेटा, आपकी मम्मी को हॉस्पिटल में एडमिट किया गया है। वो बिल्कुल ठीक है।तुम  घबराना मत ।चिंता करने वाली कोई बात नहीं है। तुम तो बहादुर बच्ची हो ।बिल्कुल डरना नहीं।मैं हूँ न।”
      चार दिनों में ही रानू  ठीक हो गई।उसके फेफड़ों का संक्रमण ठीक हो गया। वह जल्दी ही रिकवर होने लगी।
    आज पूरे सत्रह दिन हो गए ,रानू को कोरोना से लड़ते हुए पर वह आज कोरोना से जंग जीत गई है। डॉक्टर मयंक ने उसका टेस्ट किया।वह अब निगेटिव थी।उसके निगेटिव होने की खबर सुनकर सोनी खुशी से नाच उठी।
        रानू घर आ चुकी थी। सोनी खुश थी कि अब मम्मा उसे गले लगा सकती है।उसके गालों पर प्यार से चुम्बन दे सकती है। उसकी सेवा सार्थक हुई।
      आज डॉक्टर मयंक उनके घर आये और कहा-” बेटा, मैं तुम्हारे लिए कुछ लाया हूँ। सोनी ने देखा ।चॉकलेट्स  के कुछ पैकेट्स थे।
      डॉक्टर मयंक ने रानू से कहा-“मैडम, आज मैं एक विशेष बात बताने आपके यहाँ आया हूँ। बात यह है कि आपकी बेटी की तरह हूबहू मेरी एक बचपन की दोस्त थी रानू यानि कि रोहिणी शर्मा ।”
      यह सुनते ही रानू का  जी धक से रह गया तो उसका विश्वास पक्का है ।यही मयंक है।
       डॉक्टर मयंक ने कहा-” हम बचपन से लेकर आठवीं कक्षा तक साथ -साथ पढ़े। एक बार गर्मियों की छुट्टी में मैं अपने नानी के घर दूसरे गांव गया था ।तभी रानू का परिवार अचानक शहर छोड़ कर कहीं और चला गया। मैं रानू से बिछुड़ गया । उस जमाने में न कोई मोबाइल था न फोन। फोन था जरूर पर हम लोगों की पहुंच से दूर था। मैं और रानू अच्छे दोस्त तो थे पर उससे  कुछ ज्यादा भी। यह तो उसके बिछुड़ जाने पर मुझे एहसास हुआ।सारी जिंदगी मैं उसे ढूंढता रहा हूँ।मैं डॉक्टर इसलिए बना कि रानू चाहती थी। एक दिन रानू और मैं स्कूल से आ रहे थे कि एक डॉक्टर किसी के घर से  इलाज कर लौट रहा था। रानू ने डॉक्टर को देखकर कहा-“देखो मन्कु, डॉक्टर लोग कितने स्मार्ट दिखते हैं।तुम भी  बड़े होकर डॉक्टर बनना। वो तो नहीं मिली पर उसकी यह बात मुझे याद रह गई और मैंने भी प्रण कर लिया कि मैं डॉक्टर बन के रहूंगा। काश! वो मुझे मिल जाये तो मेरी जिंदगी पूरी हो जाये।”
          रानू दम साधे डॉक्टर मयंक की पूरी बात  सुनती रही और अचानक वो फफक कर रो पड़ी।
       उसे रोता हुआ देखकर मयंक  डर गए।उन्होंने कहा-“आई एम वेरी सॉरी! मेरा मकसद आपको  रुलाना नहीं था।मैं तो केवल अपनी बात बताना चाहता था।”
       अचानक रानू ने अपने चेहरे पर से मास्क हटा दिया।डॉक्टर मयंक उसे देखकर हैरान रह गए।
       “हां मयंक, मैं ही रानू हूँ। अभागी रानू। उस गर्मी की छुट्टी में पापा का ट्रांसफर आर्डर अचानक आया और हमें तत्काल रायपुर जाना पड़ा। मैंने एक चिट्ठी तुम्हारे नाम से लिखा था जो अपनी सहेली मंजू को मैंने दिया था ताकि वह तुम तक पहुंचा सके। शायद वह चिट्ठी तुम्हें नहीं मिली। उसके बाद मैं उसी शहर में पढ़ती रही।लाख चाहने के बाद तुम्हें भूल न सकी। तुम्हारा कोई सम्पर्क भी तो नहीं था। एक चिट्ठी मैंने तुम्हारे घर के पते पर भेजा था पर वह चिट्ठी लौटकर आ गई। शायद तुम लोगों ने भी वह पुराना किराए का घर छोड़ दिया था। बाद में मैंने एम.ए. बी.एड.किया और पीजीबीटी कॉलेज में प्राध्यापिका हो गई।उसी वर्ष मेरा विवाह भी हो गया। विवाह के बाद मेरा दुर्भाग्य  आ गया। ससुराल में कम दहेज के कारण सास ननद और देवर प्रताड़ित करते। मेरे पति  उन्हें कुछ न कहकर  चुप्पी साधे रहते। विवाह के एक साल बाद अचानक मेरे पति की तबियत खराब रहने लगी ।जांच में पता चला कि उन्हें ब्लड कैंसर है। विधाता को यही मंजूर था।  कुछ दिन बाद वे हमारा साथ छोड़ परलोक चले गए। तब से अकेली जिंदगी से लड़ रही हूं। आज तुम मिले। इतने वर्षों के बाद।वो भी ऐसे समय में जब हमारी उम्र ढलान पर है पर अब  क्या फायदा? हम तुम जिंदगी के एक खास मोड़ पर खड़े हैं तब?”
       ” नहीं, यही मोड़  तो हमारी जिंदगी में  नई खुशी लाने वाली है। तम्हें बता दूं कि मेरी जिंदगी में कई लड़कियां आई और गईं।टिकी कोई नहीं या कहूँ मैंने टिकने ही नहीं दिया। सच कहूं तो प्यार बार-बार नहीं सिर्फ और सिर्फ एक बार ही होता है। मेरा प्यार तो तुम थीं। तुम हो और हमेशा रहोगी।”मयंक ने मुस्कुराते हुये कहा।
       छि! तुम यह कैसी बातें करने लगे?अब मैं किसी की  विधवा हूँ।तुम भी किसी के पति होगे?”
       रानू ने धीमे स्वर से कहा।
       “नहीं बिल्कुल नहीं। मरीजों की सेवा करते-करते  मैंने शादी नहीं की। रही बात  विधवा कि तो  यह कोई अभिशाप नहीं है। अब तो विधवाएं दुबारा विवाह करने लगीं हैं।इसमें बुराई क्या है? प्यारी सी सोनी जो तुम्हारी परछाई है। उसी से तो तुम्हें मैंने पहचाना। सच कहूं तो मैंने तुम्हें उसी दिन पहचान लिया था , जिस दिन मरीज का नाम रोहिणी तिवारी  बताया गया था।बेटी ने रही सही अविश्वास की दीवार ढहा दी थी ।तुम्हारे प्रतिरूप में आकर। सोनी तो सच में सोनी है।कितनी समझदार है  बिल्कुल अपनी मम्मी की तरह। इस कोरोना में जिस तरह  उसने तुम्हारी सेवा की वैसे तो तुम्हारी सगी मां भी नहीं करती।वह नन्हीं परिचारिका कितनी भोली और प्यारी है। इस नन्हीं परिचारिका को सलाम जिसने हमें मिलाया। रानू, भले ही कोरोना कितना भी भयानक हो पर मेरे लिए यह कोरोना मेरी जिंदगी में बहार लेकर आया।मुझे तो मेरी प्यारी बेटी और तुम मिल गई।”
         यह कहते हुए डॉक्टर मयंक ने गुलदान में रखे फूलों से रानू की मांग सजा दी।
        सोनी ने ताली बजाकर इस रिश्ते का स्वागत किया।
—  डॉ. शैल चन्द्रा

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