कविता

गुलाब और कांटे

जहां गुलाब, वहां कांटे होते ही हैं,
गुलाब कांटों से डरते नहीं हैं,
कांटे ही तो उनके रक्षक हैं,
वीरव्रती मुसीबतों से डरते नहीं हैं.
गुलाब की तरह कांटों में रहकर भी,
खिल-खिल खिल-खिल खिलते रहिए,
कांटे संभलकर चलने का सबब बनेंगे,
आप तो बस साहस जुटाकर चलते चलिए.
कांटे भी फूलों की सेज बन जाते हैं,
जब राणा प्रताप से महारथी उस पर सोते हैं,
फूलों की सेज भी कांटों की तरह गड़ती है,
जब कायर कांटों की उपस्थिति से ही रोते हैं.
फूलों की तरह कांटों से भी कर लो दोस्ताना,
शूलों से दामन में खुशियों के रंग भर लो रोजाना,
कांटे ही बन जाते हैं फूलों के लिए छांव,
बाधाओं से मन को विरक्त कर, राही चैन से सो जाना.

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