सामाजिक

राष्ट्र चेतना

“राष्ट्र चेतना” यानी राष्ट्रीय भावना की जागृति। हालंकि इसका फलक बहुत ही विस्तारित है।परंतु राष्ट्र चेतना कोई मंदिर की घंटी नहीं है जो जब जी में आया बजा के चले आये।
सबसे पहले तो राष्ट्र की चेतना को थोड़ा दूर रखिए और स्वयं में चेतना की जागृति करिए। राष्ट्र चेतना की जागृति कोई खेल नहीं है।जब तक हम चैतन्य नहीं होंगे, राष्ट्र चेतना सिर्फ़ दिखावे के सिवा कुछ नहीं है।

     इसकी शुरूआत भी हमें खुद से,परिवार, पास पड़ोस, गली, मुहल्ले , गाँव, नगर, शहर से होते हुए राष्ट्र तक हो सकती है। राष्ट्रीय चेतना सिर्फ़ सीमा पर युद्ध लड़ने, दुश्मन देशों को कोसने भर से नहीं होती। यदि वास्तव में हम राष्ट्र की चेतना में योगदान देने के इच्छुक हैं, तो चलिये जागृति और चैतन्यता का अभियान खुद से शुरु कीजिए।

-आस पास, गली मोहल्ले को साफ रखने की शुरुआत कीजिए।
-जल,ऊर्जा संरक्षण कीजिए।
-सरकारी सुविधाओं का ईमानदारी से उपयोग कीजिये।
-सरकारी सुविधाओं को पात्र व्यक्ति तक पहुँचाने में योगदान दीजिए।
-भ्रष्टाचार का विरोध कीजिए।
-जन प्रतिनिधियों को उनकी जिम्मेदारी का अहसास कराइये।
-सरकार की गलत नीतियों का ही विरोध न कीजिए, सही नीतियों को खुला समर्थन दीजिए।
-विरोध के लिए विरोध न कीजिए।तार्किक ढंग से अपनी बात रखिये।
-धनबल, जनबल, बाहुबल का ढ़िंढ़ोरा न पीटकर सार्थक सदुपयोग कीजिये।
-समाज ,राष्ट्र की एक इकाई के रुप में भी अपनी जिम्मेदारी समझिए।
-सब कुछ सरकार के ऊपर  ही न छोड़िए। नागरिक के तौर पर अपनी भी जिम्मेदारी महसूस कीजिये।
-समाज और राष्ट्र आपका भी है,आपका भी दायित्व है।इसे भी समझिए।
-समाज में विघटन न फैले यह दायित्व भी हम सबका है।
-न्याय संगत भूमिका निभाइए।
-जाति धर्म के बजाय राष्ट्र धर्म की बात पर जोर दीजिए।
-राष्ट्र विरोधी बयानों, तत्वों का विरोध कीजिए।
-सैनिकों के साथ खड़ा दिखना होगा, समर्थन करना होगा।
-खुद को राष्ट्र की अस्मिता से जोड़ना होगा।
-राष्ट्र हमारा है, हमारी भी जिम्मेदारी है,यह भाव खुद में जगाना होगा।
-राष्ट्र के साथ खड़े होना सीखना होगा।
-निहित स्वार्थवश राष्ट्र को किसी भी कीमत पर राष्ट्र कोकमजोर करने के किसी प्रयास से दूर रहना होगा।
-राष्ट्र पर गर्व करना सबसे पहले सीखना होगा।
यदि वास्तव में राष्ट्र चेतना जगानी है तो पहले खुद जाग्रत होना होगा। नसीहत देने से पहले खुद अनुसरण करना होगा। नजीर पेश करना होगा। हौसला दिखाना होगा। तब राष्ट्र चेतना का झंडा बुलंद होगा।
क्योंकि राष्ट्र चेतना कोई वस्तु नहीं भावना है। जब हम चैतन्य होंगे तभी हम अपनी बात प्रभावी ढंग से रख सकते हैं, औरों का उदाहरण देने के स्थान पर खुद का उदाहरण पेश करने की बात बहुत सार्थक साबित होगी।तब हमेंं राष्ट्र चेतना जगानी नहीं पड़ेगी, बल्कि राष्ट्र चेतना की आँधी बहने लगेगी, हर ओर राष्ट्र चेतना की खुशबू महसूस होगी।