कविता

पतझड़

गिरते पत्तों को देख

निराश क्यों होते हो

यह तो पतझड़ है

नियति का लेखा है

ऋतु आयेगी

ऋतु जायेगी

जो पतझड़ न होगा

तो बसंत कैसे आएगा

एक जायेगा

तभी तो दूजा आएगा

पुराना झड़ेगा

नया खिलेगा

यही तो प्रकृति है

तू निराश क्यों होता है

अंधेरे के बाद ही तो सवेरा होता है

*ब्रजेश गुप्ता

मैं भारतीय स्टेट बैंक ,आगरा के प्रशासनिक कार्यालय से प्रबंधक के रूप में 2015 में रिटायर्ड हुआ हूं वर्तमान में पुष्पांजलि गार्डेनिया, सिकंदरा में रिटायर्ड जीवन व्यतीत कर रहा है कुछ माह से मैं अपने विचारों का संकलन कर रहा हूं M- 9917474020