सामाजिक

निरंकुश अभिव्यक्ति की आपदा

अभिव्यक्ति और दस्तावेजीकरण अब उस युग में पहुंच चुके हैं जहाँ इनकी अपार संभावनाएं और प्रचुर माध्यम उपलब्ध हैं। इनका जी भर कर और जम कर उपयोग हो रहा है। बिना किसी रोक-टोक और सीमा के बोला भी जा रहा है, लिखा भी जा रहा है, और परोसा भी जा रहा है। अब सब तरफ फ्री स्टाईल देखने में आ रही है। न भाषा की मर्यादा रही, न अभिव्यक्ति में कोई शालीनता।

अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार के नाम पर वह सब कुछ हो रहा है जो पिछले किसी युग में देखने को नहीं मिला। मेढ़कों की टर्र-टर्र, श्वानों के भौंकने और गधों के रेंकने से लेकर हाथियों के बेवक्त, बेवजह और उन्मादी होकर चिंघाड़ने जैसे हालात सब तरफ व्याप्त हैं।

कोई अकेला अपने आप में ही मगन होकर चिल्लाने लगा है, कोई मजमा जमाकर दुनिया-जहान की चर्चाओं में व्यस्त हैं, खूब सारे चैनलों पर बहस-दर-बहस में उल्कापात करते हुए अपने आपको सर्वश्रेष्ठ, वाणी सिद्ध और विद्वान सिद्ध करने में भिड़े हुए हैं। दहाड़ने वाले चिन्तकों और विदुषियों की भी कोई कमी नहीं है। इनकी बढ़ती जा रही भारी भीड़ के अनुपात में विदूषकों की भी अलग से फौज तैयार हो रही है।

इन सारों ने मिलकर ऎसा घालमेल कर डाला है कि धरती की ओजोन परत तक आंधी में टैण्ट की छत की तरह बेकाबू होकर फड़फड़ाने लगी है। हर तरफ शोर ही शोर। यही स्थिति लिखाडूओं की भी है। बेहिसाब लिखा जा रहा है। काम का कम, और दिखावे का सर्वाधिक। और ऎसे लेखन का क्या औचित्य जो चन्द दिनों में ही भरी जवानी में ही असामयिक मौत पा ले।

सोशल मीडिया के धमकने के बाद तो जैसे पूरी दुनिया में बाढ़ ही आ गई है। हर तरफ मंजर ही ऎसा दिख रहा है। बाढ़ में तैरते-उतराते-डूबते और हिचकोले खाते लेखकों, साहित्यकारों, वक्ताओं, बहस बाजों, उपदेशकों, स्टेटस लेखकाें, वीडियोग्राफरों और माउस लिए अवतरित महापुरुषोंं के चेहरे ही नज़र आते हैं। इसके सिवा कुछ दिखता ही नहीं।

छोटे से दिमाग को लेकर पैदा हुए लोग अचंभित हैं। आखिर ब्रह्माण्ड भर का ज्ञान किस खोखर में समेटें, आँखें और कान भी भगवान को कोसने लगे होंगे, अपनी क्षमता से हजार गुना काम देखकर। ज्ञानेन्दि्रयों और कर्मेन्दि्रयों का इतना अधिक शोषण सृष्टि के प्रादुर्भाव से लेकर आज तक नहीं हुआ।

हो सकता है आने वाली संतति में आंख-कान कुछ ज्यादा क्षमता वाले और पृथक आकार के हों, नई-नई डिवाईस के लिए सॉकेट साथ आएं या फिर नस-नाड़ियों की तरह एडोप्टर वायर भी जुड़ कर आएं। यही सब चलता रहा तो एक न एक दिन यह सब होगा जरूर।

हमारे चारों तरफ चुम्बकीय तरंगों, प्रदूषित विचारों और तरह-तरह के आत्मघाती नेटवर्क का पॉश पसरा है, अक्षरों और तरंगों के ऑक्टोपस दिन रात हमारे आस-पास चक्कर काटते रहकर हमारे आभामण्डल को भेदने में लगे हुए हैं। जिस्म का भीतरी नाड़ी तंत्र भी प्रभावित हो रहा है और दैनिक जीवनचर्या भी।

हम सभी की स्थिति अब साँप-छछून्दर की हो चली है। न उगलते बन रहा है, न निगलते। पराश्रित और पराधीन बने हुए हम सभी मानते तो हैं कि इन सारे झंझावातों से थोड़ा दूर आराम की जिन्दगी जिएं मगर कुछ कर नहीं पा रहे। इसे ही कहते हैं इच्छा मृत्यु का वरदान। अपने हाथों ही आत्मघात से यह किसी तरह कम नहीं है। जाना तय है। खुद मरें या परिवेशीय सूक्ष्म तरंगों और विकिरणो के घात से।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जिस तरह निरंकुशता और मर्यादाहीनता की स्थिति में जा रही है वह प्राकृतिक आपदाओं से भी अधिक खतरनाक है। यह धरती के लिए भी खतरा है और इंसानियत के लिए भी।

— डॉ. दीपक आचार्य