लघुकथा

पेट की आग

सुबह के दस बजे का समय रोड में काफी चहल-पहल शुरू हो गई थी,ठीक ऐसे समय मे एक सरकारी कार्यालय का चपराशी रामु अपने कार्यालय को खोलने और साफ-सफाई करने के लिए घर से निकलता है, तभी उसको पास में नास्ता करते हुए कचड़ा बीनने वाले को जलपान करते हुए देखा। यह वही कचड़ा बीनने वाला बिरजू था,जो रोज की तरह आज भी नास्ता कर रहा है। यह बिरजू रामु की पड़ोस में ही रहता था।जब आज रामु से रहा नही गया तो उसने पूछ ही लिया।
क्यों रामु??
तुमको बीमारी से डर नही लगता?
बिरजू ने पूछा क्यो?
तब रामु ने कहा-“अरे भई बिरजू तुम कचड़ा बीनने का काम करते हो,तुम यहाँ वहाँ घूमते रहते हो, तुम्हारे हाथ पांव कितने खराब रहते हैं, साबुन से अच्छे से धोकर जलपान किया करो,तुमको बीमारी हो सकती है।”
तब वह बिरजू कहता है-“रामु काका तुम ठीक कहते हो पर क्या करें?ये हमारी मजबूरी है बेबसी है,हम ऐसा चाहकर भी नही कर सकते!!”
रामु ने कहा-क्यों?”
तब बिरजू ने कहा-“रामु काका सब पापी पेट का सवाल है।मुझमें गरीबी का अभिशाप है।पेट के आग का सवाल है।जिसका जीवन पेट के लिए जीता है, पेट के लिए मरता है।”
काका!!हमको बीमारी से डर नही लगता!!हमको डर लगता है, भूख से! डर लगता है पेट की आग से!! पेट की आग जिस दिन नही बुझती उस दिन मेरा जमीर मुझसे बाहर हो जाता है।और उस दिन मैं, मैं नही रहता मेरा वहशीपन जाग जाता है।
रामु उसके इस जवाब को बिना कुछ कहे सुने जा रहा था,इसका प्रत्युत्तर देने के लिए कोई शब्द नही था।
वह बिरजू एक प्रश्नचिन्ह छोड़ गया था,जिसका उतर दे पाना रामु के लिए सम्भव नही था।

— अशोक पटेल”आशु”