कविता

प्यार का मौसम

बात ही बात में
चाँदनी रात में
चल पड़े जिधर कदम
जन्नत है वहीं सनम
बादलों की इस गाँव में
तारों की छॉव में
खाई है जीने मरने की कसम
आई प्यार की है मौसम
घर है ना द्वार है
बस तेरा ही प्यार है
जी लेगें ये जीवन हम
झेल कर सारे गम
फूल चमन में है खिला
कोई शिकवा ना है गिला
नसीब से है जो मिला
खुश है खुशी दिला
कोई भी नहीं है यहाँ
हम खड़े है जिस जहाँ
दो बदन एक है
कोई नहीं खेद है
शोर मच रहा है
गाँव में कुछ हो रहा है
परवाह किसे है सनम
हो जाये जब हमारा मिलन

— उदय किशोर साह