भाषा-साहित्य

मराठी को लेकर महाराष्ट्र सरकार का सराहनीय निर्णय

हाल ही में महाराष्ट्र सरकार के मंत्रिमंडल ने निर्णय लिया है कि महाराष्ट्र में तमाम दुकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के नाम अनिवार्यत: मराठी भाषा में देवनागरी लिपि में ही होंगे। पहले भी इस प्रकार का आदेश था लेकिन अब इसे पूरी गंभीरता से लागू करने का निर्णय लिया गया है। निश्चय ही अपनी जनता के हित में और जनता की भाषा और लिपि के लिए महाराष्ट्र सरकार का यह निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण एवं सराहनीय है। ज्यादातर व्यावसायिक संगठनों ने भी इसका स्वागत किया है लेकिन उन्होंने कोरोना संक्रमण के आर्थिक प्रभावों के कारण कारण इसके लिए कुछ समय की मांग की है।

यहां महत्वपूर्ण विषय यह है कि उत्तर भारत के हिंदी भाषी राज्य जहां की जनता की भाषा और राजभाषा दोनों हिंदी है। यही नहीं संघ की राजभाषा भी हिंदी है। कहने का मतलब यह है कि हर स्तर पर हिंदी के उपयोग का मार्ग खुला हुआ है। इस कारण कहीं से किसी प्रकार की असुविधा या विरोध का भी कोई औचित्य नहीं दिखता। अनेक वर्षों से भी यहाँ अनेक संस्थाओ द्वारा दुकानों और व्यावसायिक बोर्ड हिंदी में भी करवाने की मांग की जाती रही है, लेकिन किसी राज्य सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। इससे ऐसा लगता है कि हिंदी भाषी राज्य अपनी भाषाओं की उपेक्षा में अव्वल हैं।

जब महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्य इस प्रकार के निर्णय ले सकते हैं तो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान आदि राज्य अपने राज्यों में अपनी जनता की भाषा और राज्य की राजभाषा में दुकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के बोर्ड लगवाने के आदेश जारी क्यों नहीं कर सकते। आश्चर्य की बात है कि जो भाषा इन राज्यों की कानूनी रूप से राजभाषा है, उसकी ही इतनी उपेक्षा करना राजभाषा के लिए कितना घातक है इसका अनुमान लगाया जा सकता है। यदि सड़कों पर दोनों तरफ लगे बोर्ड केवल अंग्रेजी में होंगे तो आगे चलकर राजभाषा और राज्य भाषा की लिपि यानी देवनागरी कहां रहेगी? यह एक गंभीर प्रश्न है। जब भोपाल में विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित किया गया था तब यह मामला मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान और उनके सचिवों आदि के सामने भी रखा गया था तो उन्होंने इस संबंध में निर्णय लेने की बात की थी लेकिन इतने वर्ष बीत जाने पर भी अभी तक कुछ नहीं किया गया। अपने राज्य की जनता की भाषा के लिए राजभाषा के लिए और जन-भावनाओं को सम्मान देने के लिए भी ऐसा न कर पाना आश्चर्यजनक व चिंताजनक है।

जहां इनके दल की सरकार के गृह मंत्री केंद्र में अनुच्छेद 370 हटाने का साहसिक निर्णय ले सकते ,हैं वहाँ इनके मुख्यमंत्री अपने ही राज्य में अपनी ही राजभाषा, अपनी जनता की भाषा और देश की भाषा में पूर्ण लिखवाने का निर्णय नहीं ले पाते, पता नहीं ये भयभीत हैं या अंग्रेजी मोह से ग्रस्त? जनता का यह आक्रोश तर्कसंगत है कि यदि हिंदी भाषी राज्यों को अपनी राजभाषा हिंदी से इतना ही परहेज है तो ये अपनी राजभाषा हिंदी से बदलकर अंग्रेजी क्यों नहीं कर देते।

इस प्रकार का निर्णय सभी राज्यों को अपने राज्य की राजभाषा के पक्ष में लेना चाहिए। देश की जनता की जन भावनाओं और इन राज्यों की राजभाषा को उचित स्थान दिए जाने की दृष्टि से मैं तमाम राज्यों से यह अनुरोध करता हूँ कि वे महाराष्ट्र की तरह ही अपने राज्यों में भी जल्द से जल्द सभी दुकानों पर व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के बोर्डों में राज्य की राजभाषा को प्राथमिकता देते हुए बोर्डों में उसका का प्रयोग अनिवार्य करें। यह भी सुनिश्चित किया जाए कि यदि ये बोर्ड राज्य की राजभाषा के अलावा किसी अन्य भाषा में भी लिखे जाने का प्रावधान किया जाता है तो राज्य की राजभाषा की लिपि में ऊपर लिखा जाए और किसी भी स्थिति में अक्षरों का आकार दूसरी भाषा से कम न हो।

— डॉ. मोतीलाल गुप्ता ‘आदित्य’