सामाजिक

छातीकूटिए अमर रहें

दुनिया की आबादी का काफी हिस्सा औरों के सुख से दुःखी तथा औरों के दुःख से सुखी रहने वाले लोगों से भरा पड़ा है। भगवान का दिया हुआ इनके पास सब कुछ है, कहीं किसी चीज की कोई कमी नहीं है फिर भी दुःखी हैं, हमेशा अपने दुःखों, पीड़ाओं और अनमनेपन का जिक्र करते हुए मानवीय संवेदनाओं से भरे व्यक्तित्व का अहसास कराते रहते हैं।

भगवान ने जो दिया है, उसके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करने की बजाय और अधिक पाने की तीव्र लालसा इतनी अधिक है कि प्राप्त का भोग भी नहीं कर पा रहे हैं और अप्राप्त की चिन्ता में दुबले हुए जा रहे हैं। इस किस्म में दो तरह के लोग आते हैं – छाती कूटते रहने वाले और रोना रोने वाले। इन लोगों की बातों को सुनकर, भाव-भंगिमाओं को देखकर ही रोना आता है।

तरस भी आता है कि भगवान ने ऎसे लोगों को बहुत कुछ क्यों दे डाला है जिन्हें प्रसन्नता के साथ भोगना और उपयोग करना तक नहीं आता। गरीबों की अपेक्षा सम्पन्न और तमाम प्रकार के वैभवशाली अभिजात्य वर्ग के नर-नारियों में यह महामारी अधिक देखी जा रही है।

सब कुछ होते हुए भी हमेशा असन्तुष्ट रहना इनके स्वभाव का सबसे बड़ा लक्षण हो गया है। कोई अच्छा काम भी करेंगे तो चाहेंगे कि उसे वाहवाही मिले, लोग सराहें और इसकी एवज में कोई न कोई पुरस्कार, सम्मान या अभिनंदन तो प्राप्त हो ही जाए। और जब सराहना या सम्मान नहीं मिल पाता तो सारा उत्साह और उमंग धड़ाम। जितना आनंद कर्म की सफलता से प्राप्त हुआ होता है उससे कई गुना अवसाद में डूब जाते हैं। कई-कई दिनों तक इसी अवसाद में फंसे रहा करते हैं।

आज अगर छाती कूटने वालों की गणना शुरू हो जाए तो सभी जगह बहुत से लोग मिल जाएंगे जो बिना किसी कारण के छाती पीटते रहने के सिवा कुछ नहीं करते। इनके छाती पीटने के पीछे के कारणों को तलाशा जाए तो इनकी जिन्दगी से जुड़ा एक भी उचित कारण ऎसा नहीं मिलेगा जिसकी वजह से इन्हें छाती कूटनी पड़े।

दूसरों के सुखों, तरक्की और शुचिता को देखकर ये छाती कूटते रहते हैं। हर स्थान पर इन्हीं की तरह के दूसरे लोगों की भरमार है। छाती कूटने वालों में किसी प्रकार का कोई लिंगभेद नहीं है नर-नारी या उभयलिंगी सब शमिल हैं इनमें।

समान किस्म के ये आत्मक्लेशी और सदा दुःखी लोग किसी न किसी मोड़ पर मिल कर अपने छोटे-छोटे समूह बना लिया करते हैं और इन समूहों को तब तक आनंद नहीं आता है जब तक कि ये किसी न किसी बाहरी विषय या दूसरों के बारे में सोच-सोच कर छाती न पिटने लगें।

छाती कूटिया समूहों को भले ही अपने लिए कुछ भी हासिल न हो पाए, लेकिन इनके हीमोग्लोबिन कमी, शुगर, ब्लड़ प्रेशर, थॉयराइड, गठिया और दिमागी संतुलन को ठीक-ठाक रखने के लिए छाती पीटना ठीक उसी तरह जरूरी होता है जिस तरह सूअरों को थूथन रगड़कर कचरे और गंदगी के ढेर या कि गन्दे नाले से अपनी मनपसंद दुर्गन्ध की तलाशी, या फिर चूहों के लिए निरन्तर दाँत घिसने की मजबूरी अथवा झींगुरों को हर क्षण गूंजायमान रहकर नीरवता और शांति भंग की विवशता।

आने वाले समय में लगता है छाती कूटिया सम्प्रदाय या छाती कूट जाति का प्रादुर्भाव जरूर होगा ही, जिसके हर कर्म में छाती कूटने की विवशता बनी रहेगी। इसके मठाधीश की तलाश इन लोगों को अभी से आरंभ कर देनी चाहिए। जिन परिसरों में एकाध ही छातीकूटिया पैदा हो जाए, वहां तो मरघट जैसी स्थिति अपने आप पैदा हो ही जाती है। ऎसे परिसरों में इनके पास मिलने आने वाले लोग भी इन्हीं की तरह होते हैं। इन सभी को देख लगता है कि किसी के मरने पर ये सारे तीये की बैठक में ही आते रहने वाले हों।

छाती पीट-पीट कर अपने हृदय को मजबूत और निष्ठुर बनाने वाले सभी लोग धन्य हैं जिनकी वजह से शोक संवेदनाओं और रुदालियों का वजूद बना हुआ है। लगता है विधाता ने इन लोगों को केवल छाती पीटने के लिए ही धरती पर भेजा हुआ है। छाती कूटने वालों की कई किस्में हैं। बिना किसी बात के छाती कूटने वाले भी हैं और दूसरों से छाती पिटवाने वाले भी।

यही सब चलता रहा तो आने वाले दिनों में सीने की तरह फौलादी व्यक्तित्व का पैमाना भी बदल कर छाती की मजबूती होकर रह जाएगा। इसके लिए किसी को रोके नहीं, जो छाती कूटने वाले हैं उन्हें जी भर कर छाती कूटने दें। ये लोग छाती कूटना बन्द कर देंगे तो हो सकता है कि अपने हाथों में पत्थर ही थाम लें, कुछ और कर बैठें।

छातीकूटियो को देखें, उनकी छाती कूटन कला और इसके साथ निकलने वाली सांगीतिक तरंगों का भरपूर आनंद लें, मुफतिया मनोरंजन का अपना अलग ही आनंद है, इस बात को ध्यान में रखें। अपना क्या जाता है, जो मिला सो मनोरंजन, जो दिखा सो भाग्य का।

सौ बात की एक बात – इनको कूटने दें छाती, रोने दें जी भर कर। अन्यथा इस प्रजाति के कुपोषित होकर लुप्त हो जाने का खतरा भी आने वाली सदियों में सामने आ सकता है।

— डॉ. दीपक आचार्य