बाल कविता

हेल्मेट

पिता जा रहे थे बाजार
स्कूटी पर हुए सवार
तभी वंश ने सहसा रोक
हेल्मेट कहाँ , दिया था टोक
माना जाना नहीं है दूर
सिर पर हेल्मेट रहे जरूर
हो सकती सड़कों पर फिसलन
गड्ढे बन सकते हैं अड़चन
जिसने हेल्मेट नहीं लगाया
उसने संकट पास बुलाया
धूल – धुएँ से नेत्र बचाता
घर तक सकुशल वापस लाता
हेल्मेट होता सिर का गहना
गंदी बात, नहीं यदि पहना
यह लें हेल्मेट, शीघ्र लगाएँ
हाँ! अब स्कूटी से जाएँ
— गौरीशंकर वैश्य विनम्र