कविता

अपनो से हुआ उपेक्षित

अपनों से हुआ उपेक्षित
इंतजार मैं करता रहता ,
सुबह, दोपहर और शाम ।
अब नही कोई चिट्ठी आती
और ना आता पैगाम । ।
 कोई याद ना करता मुझको ,
 और ना कोई फ़ोन करे ।
सूखा पत्ता हूँ उपवन का ,
और पत्ते है हरे भरे ।।
नन्हे नन्हे प्यारे बच्चे ,
है उपवन के फूल ।
मैं भी उपवन का सदस्य हूँ ,
लोग  गए सब भूल ।।
तीव्र हवा  का झोंका मुझको ,
जाने कब ले जाएगा ।
मेरी भी सुध ले लो कोई ,
फिर पीछे पछताएगा ।।
मेरा जीवन साथी पत्ता ,
उड़कर जाने कहाँ गया ।
मैं ढूंढ़ ना पाया उसको ,
मेरा उपवन छोड़ गया ।।
सभी रंगे हैं अपने रंग में ,
मैं हुआ बेरंग ।
कमरा काल कोठरी लगता
हूँ बहुत बेचैन ।।