कहानी

कहानी – तबादले के बाद

अभी अभी खबर मिली है कि लालजी साहू ने सम्प एरिया में काम ज्वाइंन कर लिया है। सुनकर मुझे विश्वास नहीं हुआ ! सम्प एरिया में काम और लालजी साहू !नेवर-कभी नहीं !
वो ऐसी जगह न कभी काम किया है न करेगा-कर ही नहीं सकता। शेर भूखा रह जाएगा पर घास नहीं खाएगा-असंभव !
लालजी साहू तारापुर कोलियरी के सेल्स आफिस का बड़ा बाबू था। जैसे थाने का बड़ा बाबू होता है और पिछले छः सालों से सेल आफिस में पूरी मजबूती के साथ जमे हुए था। गेटपास से लेकर लोडिंग स्लीप तक, सेल चलान से लेकर रोड परमिट तक सारे काम उसके जिम्मे था। किसी काम में विलम्ब न हो इसके लिए लालजी साहू ने कई लोगों को हायर कर रखा था। उनमें से उसका बहनोई भी एक था। ताकि सभी काम जल्दी और फटाफट हो सके। काम और कमाल की जुगाड की वजह से लालजी साहू पूरे एरिया में मशहूर था। आज तक उसके काम पर कभी किसी ने अंगुली उठाई हो ऐसा न देखा न सुना था हमने। आपको अगर मालूम हो तो मुझे भी बताना जरा।
कोलियरी के अधिकारी भी आंखें बंद कर उसके काम पर भरोसा करते और पेपर्स पर साइन कर देते। जैसे लालजी साहू आदमी नहीं कोई कम्पूयटर मशीन हो। उसके किसी काम पर कभी कोई आंच आई हो ऐसा भी मैंने आज तक नहीं देखा। भले लालजी साहू घर में अपनी रोटी पर घी लगाना भूल जाता था परन्तु अधिकारियों को मखन लगाना कभी नहीं भूलता था।
“ किसी पर इस तरह भरोसा करना ठीक नहीं है “ कोई सवाल करता तो सफाई देने कई सामने खड़ा हो जाते -“ वो कोई काम गलत कर ही नहीं सकता है , हम जानते है उसे -खरा सोना है सोना “
“ उसकी जगह दूसरा कोई टिक ही नहीं सकता “ यह पत्रकार समूह की आवाज थी।
उस दिन कोयले से भरी ट्रक जो कोल डिपो पर शाम को लोड खड़ी थी चार बजे भोर जंगल रास्ते से चोरी का कोयला लिए भाग खड़ी हुई। थाने के बड़ा बाबू ने उसे धर दबोचा था। फिर भी उस पर कोई आंच नहीं आनी थी-नही आई। लापरवाही का आरोप लगा सी सी एल गार्ड पर -होम गार्ड पर भी नहीं। दो सी सी एल गार्ड सस्पेंड कर दिये गये। पर लालजी साहू को एक वार्निंग लेटर तक नहीं मिला। उसके काम और काबिलियत पर अधिकारियों का भरोसा बना रहा। लालजी साहू भी अपने कोलियरी अधिकारियों को खुश रखने वाले तरह तरह के नुस्खे आजमाते रहा। किस को वियर-दारू पसंद है किस को चिकेन चिल्ली और किसको चमड़ी पसंद है यह लालजी साहू को भली-भांति पता था। इसी दम पर तो वह अपनी जगह टिका हुआ था। पी ओ- मैनेजर बदलते रहे, एरिया जी एम बदलते रहे। लालजी साहू का भी कार्य स्थल बदलता रहा लेकिन कमाई नहीं बदला- कम नहीं हुआ। चार साल कांटा घर में काम किया और पांच साल परमिट आफिस में। इधर छः साल से सेल आफिस में अंगद की तरह जमे हुए था वो। ऐसी बात नहीं थी कि आंख मूंद सभी उसका सपोर्ट कर रहे थे, क्षेत्र के कई संगठनों की दर्जनों शिकायतें विजिलेंस आफिस के फाइलों में दबी पड़ी हुई थी। पर कोई उसे उठा कर पढ़ता भी होगा मुझे नहीं लगता था। विजिलेंस आफिस पहुंचने वाले अधिकांश पत्र डिस्पैच थ्रो आता था। लालजी साहू डिस्पैच बाबू को भी पटा रखा था। जिस पत्र को विजिलेंस अधिकारी के पास जाना चाहिए वो डस्टबिन में पहुंच जाता था।
इधर बहुत दिनों से विजिलेंस टीम की नजर लालजी साहू पर लगी हुई थी पर इस बात की खबर किसी को नहीं थी। साप्ताह दिन पहले एरिया जी एम का ट्रांसफर हो चुका था और नये जी एम डांडे साहब ने कार्यभार भी संभाल लिया था।
बहारों का एक खुशहाल जीवन जीने वाले लालजी साहू के जीवन में उस वक्त वज्रपात हुआ जब हेडक्वार्टर की विजिलेंस टीम ने तारापुर कोलियरी के कांटा घर, परमिट आफिस और सेल आफिस तीनों जगहों पर एक साथ छापेमारी कर बही-खाते जब्त कर साथ लेते चले गए।
“ तारापुर कोलियरी में विजिलेंस की छापा, लाखों रूपयों की हेरा-फेरी की अंदेशा “ अखबारों की हेडलाइन बना।
जो अखबार इसके खिलाफ मुंह नहीं खोलता था और हर माह हजारों खाते और डकार तक नहीं लेते थे वही आज लालजी साहू को लंपट तक लिखने से नहीं चूक रहे थे। ऐसे अखबारों पर लालजी साहू को मूतने का मन कर रहा था और एक दिन मूतेगा भी पर इसके लिए आपको थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा।
यधपि निशाने पर लालजी साहू आ गया था। अभी तक उसे काबिल और बेदाग समझने वाले भी एक एक कर किनारे होने लगे। एक साथ सभी का जमीर जैसे जाग उठा था खांशी की भी दवा पहुंचाने वाला लालजी साहू अब दाद खुजली वाला कुत्ता नजर आने लगा था।
कोलियरी में हड़कंप मच गया।अधिकारी सकते में आ गए। जाने किस पर कौन मुसीबत आ चढ़े। सब मुंह छिपाते फिर रहे थे। विजिलेंस आफिस के डिस्पैच बाबू को कान पकड़ उस कुर्सी से उठा बाहर कर दिया गया था। प्रोजेक्ट आफिसर ने लालजी साहू को मिलने से मना कर दिया था। सेल आफिसर सहमा हुआ था। उसे बचने का कोई उपाय नजर में नहीं आ रहा था। काम छोड़ कहीं भागा भी नहीं जा सकता था जाने कब विजिलेंस का बुलावा आ जाए। आफिस आता और सिकुड़ कर कोने में बैठा रहता था।
सबसे बुरा हाल लालजी साहू का था। उसका खाना पार नहीं हो रहा था। सोच सोच कर उसका माथा फटा जा रहा था।मदद के सारे रास्ते-नाते बंद नजर आ रहे थे। दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था।
चार दिन बाद चार बजे चीफ विजिलेंस का चौदह पन्नों का एक सिल्ड बंद लिफाफा एरिया जी एम डांडे साहब को मिला। आधे घंटे बाद ही डांडे साहब की सख्त आदेश के साथ लिफाफा तारापुर कोलियरी पहुंच गया। और घंटे भर के भीतर एक आफिस ऑडर लालजी साहू कोलियरी पियून से रिसीव कर रहा था …!
“ सम्प एरिया “ में लालजी साहू का ट्रांसफर हुआ तो उसकी सांसें फूलने लगी।
“ अब क्या होगा ३?” पत्नी लीलावती के मुख से चिंतातुर स्वर निकला।
“ होना क्या है ? घर में तुम्हारा कीटी पार्टी करना और ब्यूटी पार्लर जाना सब बंद करना होगा !”
“ बने बनाए स्टेट्स को खोकर कोई जी सकता है? मैं तो जी नहीं सकूंगी ! सहेलियों के बीच क्या साख रह जाएगी मेरी..?”
“ बने बनाए स्टेट्स खोकर आदमी कब तक जी सकेगा ?”। लालजी साहू यही तो मंथन कर रहा था पर कुछ बोला नहीं उसने।
सम्प एरिया ! पानी से लबालब भरा हुआ। बंद खादान ! आदमी कूद जाए तो जिंदा बाहर निकल न पाए। रात दिन दो मोटर पम्प लगातार बाहर पानी फेंकता हुआ। क्या लालजी साहू अब मोटर पम्पों की निगरानी करेगा ? उसकी स्कॉरपियो अब डिजल की जगह पानी से चलेगी ? बडका सवाल ! जवाब किसी के पास तोनहीं।
चौदह पन्नों का विजिलेंस रिपोर्ट लालजी साहू के सेहत को बिगाड़ने का काम किया था। रिपोर्ट में साफ लिखा था कि पिछले छः सालों से लालजी साहू सेल आफिस में रहते हुए बडे पैमाने पर हेर फेर किया और कंपनी को लाखों का चूना लगाया …!“
पिछले महीने कोल डिपो से एक लोड ट्रक बिना कागजात की भाग गयी थी। थाने के बड़ा बाबू ने उसे धर दबोचा था तब से विजिलेंस टीम लालजी साहू के पीछे पड़ी हुई थी।
ट्रांसफर के बाद का लालजी साहू के हाथ में पेमेंट स्लीप था- पन्द्रह सालों बाद बिना संडेय का पहला पेमेंट स्लीप। जब उसकी चलती थी तो कितने मजदूर कर्मचारी संडेय-पी एच डी की पैरवी कराने नेताओं के पास न जाकर उसके पास जाता था और उसके एक कहे पर लोगों को संडेय पी एच डी मिल भी जाता था। अब लालजी साहू अपना संडेय पी एच डी के लिए किसके पास जायेगा ? उसका स्कॉरपियो सड़कों पर कैसे दौड़ लगाएगी। संडेय बगैर लालजी साहू कैसे जी पायेगा ! पत्नी का ब्यूटी पार्लर का खर्च कहां से जुगाड होगा ?
जी एम डांडे साहब ने विजिलेंस चिठ्ठी पर साफ लिखा है-“ नो संडेय – नो पी एच डी- ! “
इसी बीच एक दिन लालजी साहू घूमता हुआ उस “ संम्प “ एरिया में चला गया था। जहां दो मोटर पंप लगातार खदान का पानी बाहर फेंकते मिला। पर एक भी आदमी का अता पता नहीं। भांय -भांय सी करती वह जगह बेहद डरावनी लगी थी उसे। इस जगह किसी को मार कर फेंक दिया जाए या किसी को कुछ हो जाए तो कोई ढूंढने भी नहीं आयेगा।
ऊफ ! कुछ ही देर में वह वहां से भाग खड़ा हुआ था।
कोलियरी मे संडेय -पी एच डी की महिमा और सत्यनारायण कथा की महिमा अपरम्पार ! मतलब कि कोलियरी में संडेय-पी एच डी का उतना ही महत्व है जितना कि बीबी के भाई साले की। अगर आप कोलियरी में कार्यरत है और संडेय-पी एच डी आपके पेमेंट स्लीप में नहीं जुड़ता है तो आपके घर का नेटवर्क ठीक से काम नहीं करेगा। यह भी लालजी साहू कहा करता था -मैं नहीं !
हर दिन दारू वियर के साथ चिकेन चिल्ली खाने वाले को यकायक चना चबाते गुजारा करने को कहा जाए तो उसका निर्णय घातक और खतरनाक होता है। ऐसा लोगों का मानना है। मतलब कि तब वह कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जायेगा।
लालजी साहू ने भी ऐसा ही एक निर्णय लिया था। विजिलेंस टीम रिपोर्ट पर कफ़न ओढ़ाने और चरित्रवान अफसरों को नंगा करने का निर्णय। इसके लिए वो सब कुछ दांव पर लगाने को उतावले हो उठा था। ऐसा उतावलापन कभी कभी ही किसी में देखा जाता है तो लालजी साहू ने एक दांव खेला था – एक जुआ ! चाल सही पड़ी तो लौटे दिन बहार के, उल्टे पड़े तो लोगों को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहेगा। उस स्थिति में आत्म् हत्या के लिए सम्प एरिया के बंद खादान से बेहतर जगह दूसरा नहीं हो सकता था उसके लिए…!
आज सुबह से ही उसका दिल जोर जोर से धड़क रहा था। वह शाम का इंतजार उसी तरह कर रहा था जैसे हलवाई ग्राहकों का करता है।
शाम ढल चुकी थी। ब्यूटी पार्लर से लीलावती भी आ चुकी थी। बिरयानी पैक होते ही लालजी साहू पत्नी को साथ लिये स्कॉरपियो से निकल पड़ा।
स्कॉर्पियो सीधे जी एम डांडे साहब के बंगले के बाहर जाकर रूकी। लीलावती गाड़ी से नीचे उतरी और गेट के पास जाकर खड़ी हो गई। स्कॉर्पियो कुछ आगे जाकर खड़ी हो गई थी।
कुछ देर बाद ही गेट खुल गया था। सामने छियालिस वर्षीय डांडे साहब खड़ा था।हाथ बढ़ाकर उसने लीलावती को अंदर लिया और गेट बंद कर दिया। बिरयानी की खुशबू थी या बदन की महक ! डांडे साहब बेकाबू हुए जा रहा था। चलते चलते सहसा लीलावती के पांव रूक सा गया। डांडे साहब ने कोंचा-“ रूक क्यों गई? घबराओ नही, अपना ही घर जैसा लगेगा ..!”
अंदर कमरे की सजावट बेहद शानदार थी। ऐशो आराम की सारी चीजों से सुशोभित ! आलिशान बंगले का आलिशान कमरा ! लीलावती ने अपने घर के कमरे को याद किया। कई कमियां नजर आई। अंदर से एक आह ! निकली। काश ! अपना वाला भी ऐसा ही होता !तो रानी लगती-रानी !
डांडे साहब ड्रींक बनाने में मग्न था। तभी लीलावती के कानों में आवाज पड़ी दृ“ क्या करने जा रही हो लीलावती ? घर में किटी पार्टी और तुम्हारा ब्यूटी पार्लर का दौर चलता रहे, इसीलिए यह सब तुम करने चली आई। जरा सोचो, आज डांडे साहब के बिस्तर की बिरयानी बनोगी, कल पांडेय साहब की और फिर आगे किसी ओर की ? एक बार खुली तो फिर साड़ी समेटने का मौका नहीं मिलेगा। क्या औरतें सिर्फ भोग्या वस्तु और बिस्तर की रौनक बढ़ाने के लिए ही पैदा होती है ? उसका अपना कोई जीवन नहीं होता है ? सदियों से हमें छला गया है, आज भी तुम उन्हीं का साथ देने जा रही हो। रूको ! मेरी बात सुनो। तुम पढ़ी लिखी हो समझदार भी हो। तुम्हारे पति को मालदार पद से हटाया गया है, नौकरी से नहीं। कोलियरियों में ऐसे हजारों वर्कर काम करते हैं जिनको कभी संडेय पी एच डी नहीं मिला -पता करो, उसके घर की बीवी-बेटियां यह सब कुछ करती है-फिर तुम क्यों? संडेय पी एच डी के बगैर केवल तनख्वाह के पैसों से रूखी सूखी दाल-रोटी खाकर एक आजाद जिंदगी जिया जा सकता है! निर्भर करता है आदमी की सोच पर पर ! अब तुम्हें तय करना है कि तुम कौन सी जिंदगी पसंद करती हो ३३..? “
नशे में झूमता डांडे साहब लीलावती को लीलता कि लीलावती ने उसे रोक दिया-“ रूको ! दूर हटो ! मुझे जाना है-जाने दो ३!”
“ अरे, क्या हुआ? मान भी जाओ..! मैं तुम्हारे पति को फिर कोई मालदार३!”
“ मैंने कहा न ..यह सब यहां नहीं होगा ! , मुझे आपके बिस्तर की बिरयानी नहीं बननी है। किटी पार्टी, ब्यूटी पार्लर सब बंद ! पर यह धंधा भी नहीं करूंगी३!” और वह दरवाजे की ओर लपकी पर उसके पहले डांडे साहब उस पर लपक गया। दोनों ओर से जोर अजमाइश! कशम कश!
“ कैसे नहीं होगा३.? शरीर में उबाल लाकर कहती हो यह सब यहां नहीं होगा३क्यों ..?” और डांडे साहब ने लीलावती को फिर दबोचना चाहा। तभी लीलावती ने उसे जोर से धक्का दे दी-“ नहीं ई ई..!” डांडे साहब संभल न पाए और लड़खड़ाते हुए ड्रींक टेबल से जा टकराये। अगले ही पल लीलावती कमरे से बाहर निकल आई। उसे पति की याद आई। वह दौड़ते हुए गेट तक पहुंची। गेट से बाहर निकली और बेतहाशा स्कॉर्पियो की ओर दौड़ पड़ी। जो कुछ ही दूर पर खड़ी थी। जब वह पति से लिपटी उसकी सांसें उपर नीचे हो रही थी। छाती जोर जोर से फूल पिचक रही थी। कई पल तक पति से लिपटी रही।तब कहीं जाकर उसकी जुबान खुली। बोली दृ“ लालजी मैं यह सब नहीं करूंगी। तुम मुझे जिस हाल में रखोगे, मैं तुम्हारे साथ उसी तरह गुजर बसर कर लूंगी। पर यह सब नहीं करूंगी। नौकरी है न। जैसे और जीते हैं हम भी जी लेंगे ३.!”और वह फिर पति से लिपट गई। लालजी साहू ने स्कॉपियो घर की ओर मोड़ दिया था।

— श्यामल बिहारी महतो