बाल कहानी

गौरी की होली

एक छोटी सी लड़की थी। नाम था गौरी। बहुत ही सीधी-सादी लड़की। गौरी किसी से ज्यादा बात नहीं करती थी। स्कूल में वह अपनी पढ़ाई-लिखाई से ही मतलब रखती थी। सभी बच्चे मैदान में खेलते थे,लेकिन वह चुपचाप कक्षा में बैठी रहती थी।  सहमी-सहमी सी रहती थी। क्लास के बच्चे जब उससे बातें करते थे, तभी वह कुछ बोलती थी। उसकी एक भी करीबी सहेली भी नहीं थी। छुट्टी में बच्चे जब खेलने के लिये उसे बुलाते थे, तो वह साफ मना कर देती थी। फिर बच्चों ने भी उसे बुलाना बंद कर दिया। गौरी को अकेला रहना ही पसंद था।
एक बार गौरी बीमार पड़ गयी। उसके माता -पिता गौरी को लेकर अस्पताल गये। डॉक्टर ने गौरी से पूछा- ” स्कूल में तुम्हारी कितनी सहेलियांँ हैं।’ गौरी अब भी चुप थी। फिर उसके माता- पिता ने बताया- “यह किसी के साथ नहीं खेलती। चुपचाप और अकेली रहती है।” डॉक्टर ने गौरी को समझाया- “अगर तुम दूसरे बच्चों के साथ खेलोगी, तो जल्दी ही ठीक हो जाओगी। तुम्हारा इस तरह रहना ही तुम्हारी इस बीमारी का कारण है।”
दो दिन बाद होली का त्यौहार था। सभी बच्चे मोहल्ले में होली खेल रहे थे। गौरी खिड़की से बच्चों को होली खेलते व पिचकारी चलाते देख रही थी; तो उसका भी मन होली खेलने को हुआ। लेकिन किसी से कुछ कहने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। वह चुप चाप देखती रही। बच्चे होली खेलते-खेलते खिड़की के पास आये। गौरी से कहने लगे कि आओ तुम भी हम लोगों के साथ होली खेलो। बहुत मजा आएगा।
गौरी एक ही बार में ही मान गयी। फौरन घर से बाहर आई। सबसे पहले गौरी ने अपने हाथों से सब को रंग-गुलाल लगाया। सभी बच्चों ने खुश होकर गौरी के चेहरे पर रंग-गुलाल लगाया। उस दिन से गौरी सबके साथ मिल-जुल कर रहने लगी। इस बार की होली यादगार रही।

— प्रिया देवांगन “प्रियू”