लघुकथा

ज़िंदगी के कुछ रंग ऐसे भी

पूरा मोहल्ला होली के रंगों से खेलते झूम रहा था। देहरी के पीछे धवल वस्त्र लपेटे खड़ी पच्चीस साल की सुमन वैधव्य के धवल रंग से रंगी अपनी हथेलियों में तलाश रही थी आने वाले जीवन के रंगों को, और सोच रही थी मेरी लकीरें क्यूँ फ़िकी और बेरंग है क्या मैं अब कभी नहीं खेल पाऊँगी होली। मैंने तो नही चाहा वैधव्य। बेटी की भावनाओं को बखूबी समझती थी माँ, पर समाज के ठेकेदारों से डरती नियमों के आधीन माँ ने टकोर की सुमन बेटी होली खेलने के तेरे दिन नहीं रहे बेटी भीतर आजा, उजड़ी मांग में अब गुलाल शोभा नहीं देता। कि इतने में पडोस के यहाँ वर्मा जी के घर अमरिका से आया उनका भांजा अथर्व वैधव्य के दुन्यवी नियमों से अंजान सुमन के गोरे गालों को हैपी होली कहते रंग बैठा। सारे लोग बुत की तरह फटी आँखों से देखते रह गए, सुमन थर्रथरा कर, घबरा कर काँपती, बिलखती अंदर चली गई, पर सुमन के दादाजी हाथ पकड़ कर सुमन को सबके बीच ले आए, और सारे नियम तोड़ते हुए बोले अब रंग ही गई हो तो जमकर खेलो बेटी, तुम्हें भी पूरा हक है होली खेलने का। कब तक हम अठारहवीं सदी वाले दकियानुसी रिवाज़ों से लिपटे रहेंगे किस्मत ने तुम्हारे साथ खेल खेला उसमें तुम्हारी क्या गलती है। इतनी छोटी उम्र में मैं तुम्हें इस रुप में नहीं देख सकता, पूरी दुनिया रंग-बिरंगी है एक मेरी बच्ची क्यूँ बेरंग रहे। इस पर अथर्व ने सुमन की मांग में गुलाल मलते हुए कहा दादाजी काश कि सबकी सोच आपके जैसी मुखर होती, ये लीजिए अब सिर्फ़ इस साल नहीं जन्म जन्मांतर तक आपकी सुमन मेरे संग होली खेलती रहेगी, अगर आपकी आज्ञा हो तो सुमन को मैं अपना जीवनसाथी बनाना चाहता हूँ। और सुमन तुम ये मत समझना की तुम पर तरस खाकर तुम्हें अपना रहा हूँ, मैं दिल से तुम्हें पसंद करता हूँ, अगर तुम मुझे अपने काबिल समझती हो तो ही इस रिश्ते पर हाँमी भरना। सुमन असमंजस में थी तो दादाजी ने कहा अपना लो बेटी ज़िंदगी के कुछ रंग ऐसे सुंदर भी होते है। सुमन ने पलकें झुकाकर नतमस्तक होते इकरार कर दिया तो घर वालों के साथ पूरे मोहल्ले ने इस रिश्ते पर मोहर लगाते अथर्व और सुमन को हरे, नीले, पीले, लाल, गुलाबी रंगों से सराबोर रंग दिया। और एक नयी पहल के साथ एक धवल आसमान सा फ़िका जीवन इन्द्रधनुषी रंगों में नहाते अथर्व की आगोश में पिघल गया।
— भावना ठाकर ‘भावु’