गीतिका/ग़ज़ल

नदियाँ

धरती को सरसातीं नदियाँ
दूर – दूर तक जातीं नदियाँ
उद्गम स्थल से निकली हैं
लहर – लहर कर गातीं नदियाँ
शाँत और निर्मल होती हैं
जीवों को दुलराती नदियाँ
पथ में आते कंकड़ – पत्थर
तनिक नहीं भय खातीं नदियाँ
हर पल चलती ही रहती हैं
सागर में मिल जातीं नदियाँ
माँ जैसी प्यारी होती हैं
सबसे आदर पातीं नदियाँ
करें न इन्हें प्रदूषित हम सब
बार – बार समझातीं नदियाँ
— गौरीशंकर वैश्य विनम्र
गौरीशंकर वैश्य विनम्र
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