गीतिका/ग़ज़ल

रोटी

सुंदर गोल – गोल है रोटी
जीवन में अनमोल है रोटी
पतली हो अथवा मोटी हो
भूखे हित बड़बोल है रोटी
जोड़ – तोड़ दुनियादारी सँग
पढ़ा रही भूगोल है रोटी
पाप – पुण्य के रंग चढ़ाकर
देती सबको झोल है रोटी
एक तुला पर धनी – रंक को
रखकर देती तोल है रोटी
सबसे असह्य भूख की पीड़ा
लेती तुरत टटोल है रोटी
पड़े – पड़े जो मुफ्त तोड़ते
देती खोल, पोल है रोटी
करें परिश्रम, तब पाएँगे
सदा पीटती ढोल है रोटी
— गौरीशंकर वैश्य विनम्र
गौरीशंकर वैश्य विनम्र
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