बाल कविता

चार बाल काव्यमय कथाएं- 5

आज अंतरराष्ट्रीय बाल पुस्तक दिवस है. इस अवसर प्रस्तुत है हमारी बाल पुस्तक- शृंखला “चित्रमय काव्यमय कहानियां” का पांचवां और अंतिम भाग. साथ ही आपके लिए है इस पुस्तक का लिंक भी-
https://issuu.com/shiprajan/docs/baal_pustak_1
17. लालच बुरी बला है
हड्डी एक बड़ी ले मुंह में,
कुत्ता एक बहुत हर्षाया,
कहीं अकेले में खाने की,
मन में ठान नदी पर आया.
पानी में परछाई देखी,
कुता एक हड्डी दाबे था,
सोचा उसने वह भी ले लूं,
सचमुच वो नादान बहुत था.
उसकी भी हड्डी लेने को,
जैसे अपने मुंह को खोला,
मुंह से हड्डी गिरी नदी में,
बड़ा दुःखी हो कुत्ता बोला.
”आधी छोड़ पूरी को धाए,
आधी रहे न सारी को पाए,
लालच बुरी बला है बच्चो,
अच्छा वो जो हिलमिल खाए”.
18. भालू और दो दोस्त
रामू-श्यामू दोस्त थे पक्के,
देख के सब थे हक्के-बक्के,
दोस्ती हो तो ऐसी हो,
राम-श्याम के जैसी हो.
एक बार वे दूजे गांव गए,
बीच में वन था, रस्ते नए,
जंगल से इक भालू आया,
देखके दोनों का जी घबराया.
श्याम को पेड़ पर चढ़ना आता,
वह तो पेड़ पर झट से चढ़ गया,
राम ने उससे मदद थी मांगी,
श्याम तो उस पल साफ मुकर गया.
राम ने भी इक जुगत निकाली,
सोया भू पर, सांस रुका ली,
भालू ने राम को सूंघा-देखा,,
मरा समझ निज राह पकड़ ली.
श्याम ने देखा और चकराया,
झटपट पेड़ से नीचे आया,
बोला ”क्या कह रहा था भालू,
मुझे बता, मत करना चालू”.
कहा राम ने ”भालू बोला,
तू तो सचमुच बहुत है भोला,
विपदा में जो काम न आए,
ऐसे दोस्त पर कैसा भरोसा!”
रामू बोला, ”गलती हो गई,
आगे से ऐसी भूल न होगी,
एक बार बस माफी दे-दे,
दोस्ती हमारी पक्की होगी”.
19. बोलने वाली गुफा
एक घने जंगल में शेर,
खाता पशु नहीं खाता बेर,
जो भी आता उसकी पकड़ में,
शेर उसे कर देता ढेर.
एक दिवस भटका जंगल में
पशु न एक भी उसने पाया,
पहुंचा एक गुफा के द्वार पर,
उसमें उसने डेरा जमाया.
गुफा का मालिक सियार जो आया,
पंजे शेर के देख विचारा,
अंदर जाने के निशान हैं,
लेकिन बाहर नहीं वो आया.
सोच-समझकर गुफा से बोला,
आया हूं मैं तेरा प्यारा,
रोज तो मेरा स्वागत करती,
आज मुझे क्यों नहीं पुकारा?
सोचा शेर ने मेरे डर से,
आज गुफा ने चुप्पी मारी,
”आओ प्यारे अंदर आओ”,
खुशी से उसकी दहाड़ थी भारी.
जान बचाकर सियार था भागा,
भूखा रह गया शेर बिचारा,
बुद्धि से काम लिया सियार ने,
जंगल का राजा भी हारा.
20. दर्जी और हाथी
एक था दर्जी एक था हाथी,
दोनों थे इक-दूजे के साथी,
हाथी रोज दुकान पर आता,
दर्जी उसको फल था खिलाता.
एक दिवस दर्जी का बेटा,
पिता के बदले वहां था बैठा,
रोज की भांति आया हाथी,
बेटा नहीं बन पाया साथी.
फल हेतु हाथी ने सूंड बढ़ाई,
बेटे ने उसके सुई चुभाई,
हाथी को बहुत हुई थी पीड़ा,
सुई चुभाना नहीं थी क्रीड़ा.
ऐसे न उसको छोड़ना होगा,
सबक तो कोई सिखाना होगा,
सूंड में कीचड़ भर कर लाया,
और दुकान में उसे फैलाया.
कपडे सारे ख़राब हो गए,
सिलने को आए थे जो नए,
करनी का फल उसने पाया,
हमको भी यह सबक सिखाया.
कभी न ऐसा करना भाई,
अच्छी करनी में है भलाई,
सबसे मेल बनाए रखना,
आनंद का मीठा फल चखना.
चित्रमय काव्यमय कहानियां-
इस ई.बुक के बनने की कहानी भी बड़ी विचित्र है. इस शृंखला “चित्रमय काव्यमय कहानियां” का पहला एपिसोड जब जय विजय में प्रकाशित हुआ, तब संपादक भाई विजय सिंहल जी ने कहा- “इस शृंखला में चित्र भी होते तो बहुत अच्छा होता.” हमने ऐसे ही सुपुत्र राजेंद्र तिवानी से, जो उस समय साउदी अरेबिया में पोस्टेड थे, जिक्र कर दिया. राजेंद्र ने कहा ”फाइल निकालो और जैसे कहता हूं, वैसे करते जाओ.” हम दिल्ली में थे. उसने एक-एक पेज का स्नैप शॉट लिया और झटपट ई.बुक बना दी. इसका अर्थ यह भी हुआ कि यह ऑनलाइन ई.बुक ऑनलाइन पर ही बनी थी. यह देखकर भाई विजय सिंहल बहुत खुश हुए. आप देखेंगे कि चालीस साल पहले हाथ से लिखी हुई इस पुस्तक पर कितनी मेहनत और कलाकारी की हुई है.