लघुकथा

लघुकथा  – अनोखा उपहार

              विवाह में मिले हुए उपहार को प्रभा के ससुराल वाले बड़ी उत्सुकता पूर्वक देख रहे थे। गिफ्ट में सोने -चांदी के जेवर,बर्तन, कलात्मक वस्तुएं तथा सजावटी सामान थे। तभी एक बड़े  वजनदार गिफ्ट पर सभी की नजर  पड़ी। प्रभा की ननद उसे जल्दी -जल्दी खोलने लगी। गिफ्ट पैक खुलते ही सभी की आँखे आश्चर्य से खुली की खुली रह गई। उस गिफ्ट पैकेट में पानी से भरी हुई छः बोतलें थीं। सभी बोतलों पर ‘पानी बचाओ’ का स्टीकर चिपका हुआ था।
         प्रभा की सास ने कहा,  देखो तो बहु यह किसने दिया है। पानी भी कोई गिफ्ट में देने की चीज है।अब तक किताबें, पौधे  फल-फूल सुना है  पर पानी ?? हे राम! अब ये कैसा  जमाना आ गया है।”
           प्रभा ने देखा गिफ्ट के रैपर पर’ संजू ‘लिखा हुआ था। वह  याद करने लगी। उसके मोहल्ले में एक मामूली सा दिखने वाला संजू अक्सर भीषण गर्मियों के दिनों दूसरों के घर पानी भरता हुआ दिखता। गर्मी के दिनों में उनके मोहल्ले का वाटर लेबल बहुत कम हो जाता। ऐसे में  सबको पानी की किल्लत हो जाती पर प्रभा के यहां बोर था उस पर सबमर्सिबल पम्प लगा हुआ था तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था। ऐसे में संजू दूसरे  मोहल्ले से पानी ढोने का कार्य करता ।
           जब भी प्रभा अपनी स्कूटी धोती या अपने गार्डन पर बिछे हुए मखमली घास पर पानी की पाइप से मोटी धार डालती तो संजू आते -जाते उसे गुस्से से घूर -घूर कर देखता।
         एक दिन उसे ऐसे घूरते देख कर प्रभा के डैडी ने उसे फटकार लगाई तो उसने दबी जुबान से कहा,”अंकल पानी की ऐसी बर्बादी मुझसे देखी नहीं जाती। यहाँ गरीबों को पीने के लिए पानी भी नसीब नहीं है  और यहां कार मोटर और घास पर पानी बर्बाद किया जा रहा है।मैंने पानी के लिए लोगों को आँखों से पानी बहाते हुए देखा है ।क्या आप देखना चाहेंगे ?  “
          यह कहते हुये उसने अपनी शर्ट उतार दी। उसके कंधों पर फफोले पड़ गए थे पीठ सूजी हुई दिख रही थी। उसने कहा,” रोज मेँ अपने कंधे पर पानी के पीपे लादकर दूसरे मोहल्ले से लाता हूँ ताकि जरूरत मन्द को पानी मिल सके। पानी का टैंकर तो हमारे मोहल्ले में  पहुंचते- पहुँचते ही खत्म हो जाता है अंकल मेँ कोई नौकर नहीं हूँ।यह काम मेँ अपनी  खुशी के लिए करता हूँ।”
           यह सुनकर डैडी संजू से बेहद प्रभावित हुए। उस दिन से डैडी ने मोहल्ले वालों को पानी देने का विचार किया।        यह सब बातें याद करते हुए प्रभा की आँखे सजल हो गई। उसने उन पानी के बोतलों को अपने आँचल में समेट लिया।
— डॉ. शैल चन्द्रा