बाल कहानी

बाल कहानी – जैसे को तैसा

रानी कोयल और मनु बंदर की कलाकारी से सिंघोला बाग ही नहीं; वरन् आसपास की सारी बगिया वाकिफ थी। रानी कोयल गायन में माहिर थी; तो मनु बंदर था एक नंबर का नर्तक। दोनों को गायन व नर्तन के नियमों की बहुत अच्छी जानकारी थी। उनकी कलाकारी की अंचल में तूती बोलती थी। वे दोनों कहीं भी कार्यक्रम देने जाते, तो छा जाते थे। उनमें बड़ा गजब का तालमेल था। पूरे अंचल में उन्हें नेम व फेम दोनों प्राप्त था। पर किसी में भी हो, जब कोई भी गुण-विशेष हावी होता है, तो साथ-साथ उनमें अवगुण भी अवश्य पनपता है; और बस यही हाल था रानी कोयल और मनु बंदर का। जब भी दोनों एक साथ होते तो वे दूसरों से अपनी तारीफ सुनकर अपने स्टेटस तक भूल जाते; और फिर उनका शुरू हो जाता, आ…आ…सा…रे…गा…मा…; और तक्…धिना…धिन…। वे भूल जाते कि कहाँ पर क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए। साथ ही; अपनी प्रसिद्धि के चलते उनमें घमंड भी आ गया था।
         रानी कोयल और मनु बंदर में एक और खास बात थी कि वे एक ही आम पेड़ पर रहते थे। आमवृक्ष बहुत बड़ा और छायादार था। समय आने पर खूब फूलता-फलता था। रानी कोयल व मनु बंदर पेड़ पर अपना एकाधिकार समझते थे। पेड़ के नीचे किसी का बैठना, उस पर चढ़ना व फलों को तोड़ना उन्हें बिल्कुल नहीं सुहाता।
         एक बार की बात है। रानी कोयल और मनु बंदर बहुत दूर से कार्यक्रम देकर आए थे। बहुत थके हुए थे। पेड़ पर आराम कर रहे थे। तभी अचानक रानी कोयल की नजर पेड़ के नीचे एक साधु पर पड़ी। उसने आँखों से इशारा करके मनु बंदर को अवगत कराया। फिर साधु से दोनों एक साथ बोले- ” ऐ कौन हैं आप ? क्या कर रहे हैं ?”
        “मैं एक साधु हूँ। बहुत दूर से चलकर आया हूँ। बड़ी जोर से भूख लगी है। पके हुए फलों को देख कर मुझे खाने की इच्छा हुई। इसलिए कुछ फल तोड़ने का प्रयत्न कर रहा हूँ।” साधु की बातों में बड़ी विनम्रता थी।
         “नहीं ! आप जो भी हैं; पर इस पेड़ का एक भी फल आप नहीं तोड़ सकते। यह पेड़ हमारा है। इस पर केवल हमारा ही अधिकार है।” मनु बंदर बोला।
         “और न ही आप इस पेड़ के नीचे बैठ सकते हैं। यह पेड़ हमारी देखभाल में है।” रानी कोयल फुदक कर तनिक आगे आयी।
          “नहीं ! एक पेड़, नदी, पर्वत अथवा प्रकृति की कोई भी रचना एकाधिकृत नहीं होती। उन पर सबका समान अधिकार होता है।” साधु ने मुस्कुराते हुए अपना कमंडल उठाया।
          “साधु ! कदाचित आपको नहीं मालूम कि हम दोनों इस क्षेत्र के नामी कलाकार हैं। हम दोनों जैसा नृत्य-गायन का प्रदर्शन कोई माई का लाल नहीं कर सकता। हम दोनों छोटे-वोटे कलाकार नहीं हैं। प्रतिस्पर्धा की बात करें तो हमसे कोई लोहा नहीं ले सकता। इसलिए इस आमवृक्ष को पारितोषिक तौर पर बगिया के रहने वालों ने हमारे लिए अधिकृत किया है। यह केवल हमारा है। आप इस पेड़ का किसी भी तरह से उपयोग नहीं कर सकते। बेहतर होगा कि आप यहाँ से चले जावें।” रानी कोयल व मनु बंदर के तिरस्कृत शब्द निकले।
          “ठीक है। मैं चला जाता हूँ । अपनी कलाकारी पर तुम्हें इतना घमंड करना अच्छी बात नहीं है। ज्ञात रहे कि एक दिन ऐसा समय आएगा कि तुम्हें अपनी कला की निपुणता पर ही पछताना पड़ेगा। पेड़ के कुछेक फल ही तोड़ने के लिए आज मुझे मना कर रहे हो। पर याद रखना उस दिन एक भी फल तुम्हारे नहीं होंगे।” शापित शब्दों का उपयोग करते हुए साधु वहाँ से चला गया।
        एक साल बीत गया। एक दिन एक थका हुआ पथिक उस आमवृक्ष के नीचे आकर खड़ा हुआ। हल्की हवा चल रही थी। वृक्ष की घनी छाया उसे अच्छी लगी। बैठ कर विश्राम करने लगा। अचानक उसने ऊपर की ओर देखा। पेड़ पके हुए फलों से लदा हुआ था। तभी मनु बंदर और रानी कोयल को पथिक ने देख लिया। विनम्र भाव से बोला- ” ऐ मीठी आवाज की धनी कोयल ! ऐ वानरराज ! मुझे कुछ पके हुए फल चाहिए। मैं अपने बेटे के पास जा रहा हूँ। उसके छोटे-छोटे बच्चे हैं। उन बच्चों के लिए मैं इन्हें ले जाना चाहता हूँ।”
        “नहीं…नहीं…! एक भी फल नहीं मिल सकता तुम्हें; और हाँ , अगर तुम अपने नाती-पोतों के लिए फल ले जाना ही चाहते हो तो हवा के चलने से नीचे गिरे हुए फलों को उठा सकते हो।” कहकर मनु बंदर ने पथिक का बोलना बंद कर दिया। पथिक बहुत कुछ बोलना चाहता तो था, पर अब इतना ही बोलना उचित समझा- “इस वृक्ष के नीचे अपनी इच्छानुसार आराम तो कर सकता हूँ न ?”
         “निस्संदेह ! तुम बिल्कुल तब तक आराम कर सकते हो जब तक तुम्हारी  इच्छा हो।” मनु बंदर फिर बोला।
         “अवश्य आराम कर लो पथिक। अपने से ही गिरे हुए फलों को उठा सकते हो; और ले जा भी सकते हो।” रानी कोयल का कहना हुआ।
          कुछ देर तक पथिक बैठा रहा। रानी कोयल और मनु बंदर वृक्ष पर आराम कर रहे थे । फिर पथिक गिरे हुए फलों को बीन-बीनकर देखने लगा। सारे फल खराब लगे। उन फलों को बच्चों के लिए ले जाना उचित नहीं लगा रहा था। तभी उसके मन में विचार आया। उसने रानी कोयल एवं मनु बंदर से कहा- “मैंने सुना है कि तुम दोनों बहुत मशहूर कलाकार हो। सारी बगिया तुम दोनों के हुनर का जी खोलकर तारीफ करते हैं। सबका मानना है कि तुम दोनों जैसा कोई नाच-गा नहीं सकता। परंतु….!”
         “परंतु क्या…पथिक ?” कहते हुए रानी कोयल फुदक कर पथिक के और करीब चली गयी।
         “परंतु… मैं भला कैसे मान लूँ कि तुम दोनों बहुत अच्छे कलाकार हो ?” आँख मटकाते हुए पथिक बोला।
         “पथिक ! तुम्हें हमारी कलाकारी पर संदेह है ?” पथिक इस बगीचे में ही नहीं, बल्कि आसपास कहीं भी कोई भी गायन व नृत्य में हमारा सामना नहीं कर सकता।” रानी कोयल व मनु बंदर के स्वर में बड़ा दर्प था।
           “मैं मान ही नहीं सकता कि कहीं भी तुम दोनों जैसे कलाकार नहीं होंगे।” पथिक में फिर संदेहपूर्ण विचार उभरा।
          “पथिक की बातें सुन रानी कोयल से नहीं रहा गया। बोली- “तो ठीक है, मैं दिखाऊँ तुम्हें अपनी प्रतिभा। दिखाऊँगी तब तो मानोगे ना ?” उसने कुछ न सोचा न समझा, बस अपना शुरू कर दिया। जैसे ही उसने गाना शुरू किया, मनु बंदर का मटकना शुरू हो गया। गाने का स्वर ऊँचा होने लगा। गाते-गाते कोयल रानी एकदम मगन हो गयी। उसकी तान सुनकर बंदर से भी नहीं रहा गया। उसका भी मन तेजी से नाचने को हुआ। नाचते-नाचते मनु बंदर एक डाल से दूसरे डाल पर जोर-जोर से कूदने लगा। उसके कूदने से पके फल गिरने लगे। फिर रानी कोयल ने गाना बंद किया और मनु बंदर ने अपना नाचना। दोनों ने देखा कि वृक्ष के नीचे पथिक ने गिरे हुए ताजे व पके फलों को बीन-बीनकर अपना थैला भर लिया है। फिर रानी कोयल व मनु बंदर पर नजर डालते हुए पथिक मुस्कुराते हुए कहा- ” बहुत-बहुत धन्यवाद तुम दोनों को।” तभी क्षण भर पश्चात रानी कोयल और मनु बंदर देखते हैं कि पेड़ के नीचे वही साधु खड़े हैं, जो साल भर पहले आये थे।
          फिर साधु एक हाथ में अपना कमंडल व दूसरे हाथ में थैलाभर आम लेकर वहाँ से चलने लगे। रानी कोयल व मनु बंदर साधु को अपनी आँखों से ओझल होते तक देखते ही रहे।
— टीकेश्वर सिन्हा “गब्दीवाला”