पुस्तक समीक्षा

मानवीय संवेदनाओं की प्रहरी है डॉ. अंजु सक्सेना की कविताएं

श्रीमती डॉक्टर अंजु सक्सेना एक अनुभवी कवयित्री एवं सधी हुई साहित्यकार हैं। अपने काव्य संग्रह “गुबार” में हर तरह की रचनाओं से पाठकों का ध्यान अनेक पहलुओं पर आकर्षित किया है।इस काव्य संग्रह में 70 रचनाएं समाहित है । जिसमें  मानवता, नैतिकता, न्याय,अधिकार, पर्यावरण,सकारात्मक ऊर्जा, नीतिपरक,आशावादी दृष्टिकोण, रहस्यवाद, भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज,अन्याय के प्रति आवाज, प्रकृति की रक्षा, स्त्री के अधिकारों की रक्षा, लोकतंत्र की रक्षा, बच्चें बचपन की रक्षा तथा राष्ट्रीयता से ओतप्रोत अनेक बिंदुओं पर चिंतनशील रचनाओं से पाठकों के मन को मोहित एवं आकर्षित किया है । आपकी रचना प्रारंभ से अंत तक बंधी होती है। सहज भाषा में उर्दू मिश्रित शब्दों से कविताओं में मीठास का रस घोलता है। प्रत्येक कविता का गहरा मर्म है।शिक्षाप्रद रचनाओं को पढ़ने पर दोबारा पढ़ने का मन मचलता है। डॉ.सक्सेना ने अपने उत्कृष्ट रचनाओं के माध्यम से देश की, समाज की एवं परिवार की समस्याओं को बड़ी गंभीरता एवं जिम्मेदारी से उठाया है।कवयित्री बहुत ही संवेदनशील हैं। सम सामयिक विषयों को उठा कर विश्व पटल पर रखने का प्रयास करती हैं। अपनी रचनाओं के माध्यम से दो टूक कहना इनका फक्कड़पन है। अपनी लघु रचनाओं में बड़ी-बड़ी बात कहना कवयित्री का सहज और स्वाभाविक गुण है। डॉ. श्रीमती सक्सेना की प्रत्येक रचना अनुपम और बेजोड़ है। उन्होंने नारी शक्ति का आभास करा कर अपनी रचनाओं के माध्यम से यथार्थ को उजागर करने का भरसक प्रयास किया है।
           अपने काव्य संग्रह “गुबार” की प्रथम रचना हसरतें में कवयित्री कहती है कि “हसरते क्या है… होंसलों के खुले आसमान में उड़ती पतंगे ही तो है।” कविता के अंतिम पंक्तियां मन को छूने वाली है-
“या तकदीर जिसका इस्तकबाल करे,
 वही मंजिल पा जाती है हसरतें।”
वाकई में हसरतें आकाश में उड़ती पतंग की भांति हैं किंतु सच में किस्मत के स्वागत पर ही मंजिल का मुकाम हासिल कर सकती है हसरतें। ‘स्त्री की व्यथा’ में आज की स्त्री अपना हक नहीं बल्कि बराबर का दर्जा मांगती है। न्याय मांगती है। क्योंकि वह भी एक इंसान है-
“प्रेम का मरहम कभी तुम बन ना सके।
मैं स्त्री सदा बनी रही आधार तुम्हारा
 मेरा संबल तुम बन ना सके।”
‘चलो,उसी राह पर फिर चले’ में डॉ. सक्सेना सकारात्मक ऊर्जा के साथ में कहती है की स्त्री, पुरुष को हर मुसीबत में जब कंधे से कंधा दे सकती है तो क्या पुरुष को एक औरत का ख्याल नहीं रखना चाहिए कि पुरुष भी इस बात को समझे तो फिर कहना ही क्या!
‘शातिर लोग’ एक नीतिपरक रचना है मानवीय संवेदनाएं एवं हकीकत का यथार्थ बयां करने वाली रचना है। मानवीय चेहरे पर ढके मुखोटे को उतारती है -“हैरान हूं मैं यह सोचकर, क्यूं, कैसे… झूठे शातिर लोग खुद को , नेक दिखा दिया करते हैं।”
“मित्र,कृष्ण सरीखे बन रहना” में मित्र में एक प्यारा रिश्ता खोजती, समझती, सिखलाती रचना है। जो आज के समय में बहुत कुछ बयां करती है। “एक ये दौर है” में जीवन में आशा और निराशा के दौर हमेशा जीवन भर चलते रहते हैं। समय कभी भी एक जैसा नहीं होता है। समय,धन,शोहरत, उम्र में बदलाव होना जग विख्यात है। कविता “दरमियां” में पति-पत्नी की अगाध प्रेम – स्नेह-विश्वास-इंतजार की सुगंध से रिश्ते में मिठास को घोलने वाली रचना है। जिसमें अगाध समर्पण होता है। पति- पत्नी के रिश्ते में यही भाव जीवन भर बांधे रखता है- एक दूसरे को।’मन की उलझन’ में रहस्यवाद का पुट देखने को मिलता है। इहीलोक और परलोक के बीच मानवीय द्वंद हमेशा बना रहता है। प्रत्येक इंसान इसका समाधान चाहता है पर इतना आसान कहां ? रहस्यवाद का सुंदर उदाहरण है। “नन्हीं बाहें” बाल मनोविश्लेषण से ओतप्रोत रचना है। “वाकई पत्थर होते हैं” एक नीतिपरक इंसानियत का यथार्थ पेश करती रचना है जो समाज में अंगद लोग अनगढ़ पत्थर की तरह होते हैं।  “चलो, बेफिक्री की एक महफिल सजाते हैं।” में मनमौला मदमस्त जीवन जीने के लिए कवयित्री एक सकारात्मक ऊर्जा के साथ आह्वान करती हुई कहती है कि जीवन में अनेक कष्टों को हराकर, गमों को भूलाकर जीवन जीने की महफिल सजाने की हिमाकत की है।डॉ. सक्सेना अपनी रचना ‘विकर्ण की आवाज’ में समाज, सरकार में हो रहे भ्रष्टाचार,अन्याय के विरोध स्वरूप देश की पवित्र आत्माओं को लड़ने हेतु उठ खड़े होने के लिए आह्वान करती है और आशावादी दृष्टिकोण से जीतने की बात करती है।
“कैसी यह इक्कीसवीं सदी?” में कवयित्री ने देश की नई पीढ़ी के सामने गरीबी,भुखमरी, शिक्षा, चिकित्सा के संकट को गिनाया है। यह कैसा विकास है? कैसी इंसानियत है ? और बढ़ते भ्रष्टाचार पर रोष जताया है-
“चिकित्सा,भोजन ,शिक्षा के अभाव में
 पंगु हो रही देश की नव पीढ़ी
 बैसाखियों के सहारे कैसे
 चढ़ पाएगी ये विकास की सीढ़ी ?”
‘स्वार्थ की विभीषिका’ रचना में कवियत्री ने बहुत ही गंभीर सवालों को अपनी रचनाओं में उठाया है। भौतिकवादी युग में मानवता तड़प रही है। हम उसे विकास कह रहे है। दुर्घटना पर मौन हैं। अपने स्वार्थ में जी रहा वह कौन है? वास्तव में आज का स्वार्थ से लिपटा भौतिकवादी मानव।
                     ‘क्या वाकई मेरा देश महान है?’ रचना के माध्यम से कवयित्री अपनी व्यंग्यात्मक शैली से देश के यथार्थ पर गरज उठती है। ‘खोफ खुदा का’ रचना में कवयित्री कहती है कि आज का इंसान,ईश्वर के डर को भूलकर इंसानियत तक गंवा चुका है –
“फितरत ए दगाबाजी आज
न जाने क्यों लोगों की
रग-रग में समाई है।
माटी के तन की हवस पूरा करने की धुन में इंसानियत तक गंवायी है।”
अपनी रचनाओं में मर्मस्पर्शी पंक्तियों से भी पाठकों का ध्यान खींचा है कविता -“फिर अजनबी बन जाएंगे” में – “खारी झील शहद की चंद बूंदों से मीठी नहीं हुआ करती!”
कवयित्री, बदलते परिवेश पर भी चिंता करती है तो मानवता पर भी। ‘स्त्री की चाहत’ में स्त्री अपनी आजादी के साथ-साथ अपने खुद के बुने हुए सपनों को पूरा करना चाहती है।वो चाहती है कि जीवन साथी का पूरा सहयोग मिले तो जीवन समर्पण पूजा से कम नहीं होगा।
-“कुछ सपने मेरे भी है
जो तुम संग पूरे करने हैं
 एक खाका जो खींचा था मैंने,
 तुम संग रंग उसमें भरने हैं।”
‘पुलवामा विशेष’ में डॉ. सक्सेना देश के युवा वीर जवानों पर गर्व करती है हमारी सेना, हमारे देश के वीर जवानों पर सब को नाज है जिस के दिलों में अपनी मातृभूमि पर प्यार- मोहब्बत है इसी वजह से उसके सीने में सदा प्रतिशोध की ज्वाला धधकती रहती है।
 ‘स्त्री कभी कमजोर नहीं होती’ में डॉ अंजु सक्सेना नारी शक्ति को सर्वश्रेष्ठ शक्ति के रूप में देखती है। स्त्री सिर्फ घर, परिवार, बच्चों की खातिर अपनी इच्छाओं का ,अधिकारों का समर्पण कर देती है-
 “और जीवन की कोरे पन्नों में
 रंग भरती है
अपनों की उम्मीदों के,
 आशाओं के।
 स्त्री ठान ले तो,
 क्या नहीं कर सकती।
 कैकेयी का हट,
अहिल्या का तप,
सावित्री का सत
याद है ना…।
पर अपने अधिकार, इच्छाएं
सब समर्पण कर देती है
 सिर्फ घर, परिवार,
पति,बच्चों की खातिर।
और लोग सोचते हैं
स्त्रि कमजोर होती है।”
‘आज की किताबें’ में आज के बच्चों का यथार्थ डॉ.अंजु सक्सेना ने अपनी रचना में उकेरा है। किसी जमाने में किताबें बच्चों के दिलो-दिमाग में जगह बनाकर राज करती थी पर आज वह स्थिति नहीं और नहीं उन किताबों की महक है ना सम्मोहन है। आज बच्चों की तो मोबाइल की दुनिया है। उन्हें आकर्षित करती है। अपनी रचना ‘सत्य’ में नए प्रयोग से कवयित्री ने सत्य की परिभाषा को सुंदर उदाहरण से परिभाषित किया है; अद्भुत है-
 “झूठ की होलिका के जलते ही
 सत्य प्रहलाद की तरह प्रकट होता है।”
‘किसलिए’ एक सुंदर रचना है जिसमें डॉ. सक्सेना कहती है यथार्थ को अपने अलग अंदाज में –
“जिसे सताया वो जानता है
 तुझे अच्छे से
फिर दुनिया के सामने
 बनावट किसलिए”
‘सौदा न कीजिए’ में लोकतंत्र को बचाने से पहले अपने ईमान को बचाने की हिदायत देती हुई डॉ.सक्सेना कहती है-
 “आप कहते हैं कि
लोकतंत्र खतरे में है
जरा गरेबान में झांकिए
आपका ईमान खतरे में।”
‘सुनो धरा के वीर सपूतों!’ जैसी राष्ट्रीयता से ओतप्रोत रचना में दुश्मन देश के दुश्मनों से देश की आंतरिक दुश्मनों की चिंता व्यक्त की है-“हिम्मत यूं ही नहीं बढ़ती उसकी
अपनी धरती पर गद्दार बहुत है।”
सकारात्मक ऊर्जा देने वाली रचना है -‘फिर से उजड़े दिलों की बस्ती बसाई जाए’ अनाथालय में मजबूर मांओं के हक की बात करती है हुई यह रचना है तो दहेज लोभी ऊपर भी कटाक्ष करती है। डॉ.सक्सेना सदा सकारात्मक दृष्टिकोण को लेकर चलने वाली सकारात्मक ऊर्जा की मशाल को जलाने वाली कवयित्री है। ‘हे ईश्वर’ कविता में कहती है-
“हे ईश्वर! जीवन में चाहे मुश्किलें कितनी भी देना,
पर उन से जूझने का हौसला सदा देना।
घिरने लगूं जब घोर निराशा में
आस की ज्योत जगा देना।”
कवयित्री डॉ.अंजु सक्सेना ने अपनी लेखनी की धार से मानवीय संवेदना से ज्ञान रूपी बूंदों की वर्षा की है। पूरी कविता अपने खुद को बांधती है। जिसे पाठक पूरी पढ़ें बिना चैन नहीं ले सकता है। मैडम जी सक्सेना को तहे दिल से हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई देता हूं कि वह  निरंतर इसी तरह अपनी लेखनी के माध्यम से साहित्य सेवा में रत रहे। साहित्य की सेवा करती रहे। पाठकों एवं साहित्य प्रेमियों का मार्ग प्रशस्त करती रहे इसी आशा और विश्वास के साथ। मेरी असीम शुभकामनाएं।
-समीक्षक डॉ.कान्ति लाल यादव