इतिहास

नैनागिरि की आदिजिन पंचतीर्थी पुरातन प्रतिमा

मध्यप्रदेश के छतरपुर जिलान्तर्गत नैनागिरि-रेसिन्दीगिरि अतिशय-सिद्ध क्षेत्र है। बाईसवें तीर्थंकर नेमिनाथ के काल से  इस तीर्थ का संबंध है। उस समय यहां से वरदत्त, सायरदत्त, गुणदत्त और मुनीन्द्रदत्त मुनि मोक्ष पधारे, लगभग दो हजार वर्ष पहले की रचना णिव्वाणभत्ति में इसका उल्लेख है। यह महान तीर्थ क्षेत्र तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की उपदेश भूमि- जिसे समवसरण कहा जाता है- रही है। यहां यात्रियों के ठहरने के लिए आधुनिक धर्मशाला है। यहां मुण्डीटोरी, इन्द्रवन, तलहटी के 17 मंदिर और पहाड़ी के 38 जिनालय और प्राचीन प्रतिमाएँ दर्शनीय हैं।
नैनागिरि की पहाड़ी पर से उत्खनन में कई प्राचीन मूर्तियां प्राप्त हुई थीं। तीर्थंकर ऋषभनाथ की पंचतीर्थी प्रतिमा उन्हीं में से एक है। यह प्रतिमा पुरातत्त्व व मूर्तिकला और शिल्पकला के इतिहास की दृष्टि से अत्यंत महत्व की है। इसका परिकर प्राचीन मूर्तिकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह लाल पाषाण के 52 इंच ऊँचे और 25 इंच चौड़े शिलाफलक पर, पंचतीर्थी सपरिकर प्रतिमा है।
इस प्रतिमा में सबसे नीचे आसन में सिंहासन के दो सिंह अंकित हैं, जिनका बाहरी तरफ का पैर कुछ ऊपर को स्तंभ के सहारे उठा हुआ है। सिंहों से कुछ पीछे को दाहिनी ओर गोमुख यक्ष एवं बायीं ओर चक्रेश्वरी यक्षिणी अंकित है। शास्त्रों में ये चौबीसों तीर्थंकरों के अलग अलग यक्ष-यक्षिणी वर्णित हैं, तीर्थंकर ऋषभनाथ के गोमुख यक्ष और चक्रेश्वरी यक्षिणी कहे गये हैं। इस प्रतिमा के सिंहासन में बीच में आगे को नक्कासी है, किन्तु इसमें मृगदाव जैसे विरुद्धाभिमुख दो शार्दुल अंकित हैं। शार्दुल डायनासौर जैसा बड़ा जानवर था जिसका शरीर शेर जैसा होता था, किन्तु विशालता में हाथी के बराबर या हाथी से बड़ा, फुर्तीला जानवर बताया गया है, इसी के नाम पर शार्दुलविक्रीड़ित छंद है। अन्यत्र जैन प्रतिमाओं पर यह अंकन नहीं मिलता है। सिंहासन के ऊपर भी एक सामान्य आसन है, जिस पर मूलनायक प्रतिमा पद्मासन में विराजमान है। सिंहासन पर आगे बीच में शार्दुलद्वय के ऊपर एक वृषभ (बैल) अंकित है। जो प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ का लांछन-चिह्न है। ऋषभनाथ को वृषभनाथ और आदिनाथ भी कहते हैं।
उसी सिंहासन पर हाथ जोड़े, नतमस्तक भक्त-युगल बैठा दर्शाया गया है। पुरुष भक्त दाहिनी ओर तथा स्त्री-भक्त बायीं ओर शिल्पित है। दोनों के मस्तक प्रतिमा के पद्मासन के मुड़े हुए पैरों से छू रहे हैं। इसमें यह विभेद नहीं दर्शाया गया है कि स्त्री का जिन-प्रतिमा से स्पर्श होना चाहिए या नहीं। सिंहासन पर कुछ पीछे को जहां यक्ष-यक्षी बने हैं उनके ऊपर के स्थान पर दोनों ओर कलायुक्त चँवरधारी शिल्पित हैं। तीर्थंकर के अष्ट प्रातिहार्यों में ‘चामरयुग्मे’ चँवरधारी युगल कहे गये हेैं। इस प्रतिमा के चँवरधारियों के देवतुल्य वेशभूषा है। शिरोमुकुट, बाजुबंद, कुण्डल, दोहरा गलहार, यज्ञोपवीत, कटिबंध, अधोवस्त्र, पैजनिया आदि आभूषण भूषित उकेरे गये हैं। चँवरधारियों के प्रतिमा की ओर के हाथ में चँवर ढुराते हुए प्रदर्शित हैं। अर्थात् एक के बांयें हाथ में तथा एक के दायें हाथ में चँवर है।
परिकर को ही आगे देखें तो चँवरधारियों के ऊपर एक-एक देव ऐसे बने हैं जो आकाश में तो विचरण कर रहे हैं, किन्तु अपने ऊपर भारी बजन ढो रहे हैं, वह भार है हाथियों का। देव के ऊपर बड़ा तख्ता है, उसके ऊपर हाथी खड़ा है, हाथी के ऊपर एक एक युगल बैठा है। आगे आगे पुरुष है जो हाथों में बड़ा सा कलश लेकर प्रभु का अभिषेक करते हुए दर्शाया गया है, पुरुष के पीछे हाथी पर स्त्री बैठी है, जिसके हाथों में संभवतः माला है। यह दोनों ओर की स्थिति है। प्रभु की छवि इतनी विशाल है कि हाथी पर बैठ कर भी व्यक्ति अभिषेक करने उतने ऊपर नहीं पहुँच पाता इसलिए देवों ने हाथियों को ही ऊपर आकाश में उठा लिया अंकित है। यहां भी देवों को आभूषण-भूषित दिखाया गया है।
मूलनायक प्रतिमा जी के ऊपर कलात्मक छत्रत्रय है। छत्रत्रय के दोनों ओर पूर्ण आभूषण पहिने माल्यधारी देव अंकित हैं, ये अपने अपने दोनों हाथों में कलायुक्त पुष्पमाला लिये हुए हैं। छत्रत्रय के ऊपर श्रीफल युक्त कलश बना है, कलश के पीछे और छत्रत्रय के ऊपर दुंदुभि बादक (ढोलक बादक) शिल्पित है। प्रायः दर्शनार्थी की दृष्टि इस तक सहज नहीं पहुंचती है, किन्तु इसके बिना परिकर पूर्ण नहीं होता, यह भी अष्ट-प्रातिहार्यों में से एक है।
मुख्य प्रतिमा जी का नासाग्रदृष्टियुक्त मुखमण्डल बहुत ही मनमोहक है। हम तो कहेंगे कि नैनागिरि जी की जितनी भी प्रतिमाएँ हैं, उन सब में सर्वाधिक मनमोहनी प्रतिमा यह है। इसके उष्णीस के साथ घुंघराले केश उकरित हैं। लंबे कर्ण और उन कर्णों के पीछे से दोनों ओर से त्रिजटायुक्त केश स्कंधों पर लटके हुए अंकित हैं। जैन मूर्तिकला के प्रारंभिक समय में चौबीस तीर्थंकरों के लांछन-चिह्न नहीं मिलते हैं। केवल दो ही तीर्थंकरों की पहचान हुई- एक तो प्रथम तीर्थंकर की स्कंध पर लटकी हुईं केश-जटाएँ तथा मस्तक पर कलात्मक जटा-जूट अंकन से और दूसरे 23वें तीर्थंकर की पार्श्वनाथ की सर्पफणाटोप से। इसके बाद सुपार्श्वनाथ के पांच फणाटोप और पार्श्वनाथ के सात, नौ तथा अधिक फणाटोप का अंकन होने लगा। बाद के कालखण्डों में शनैः शनैः चौबीसों तीर्थंकरों के लांछनों का अंकन होने लगा।
शिलाफलक की इस मुख्य प्रतिमा के वक्ष पर श्रीवत्स का चिह्न, व्यवस्थित उदर, नाभि आदि बहुत ही संतुलित गढ़े गये हैं। पद्मासन होने से दोनों पैरों के तलुए व अंगुलियां स्पष्ट देखीं जा सकतीं हैं, बल्कि पद्मासन लगाने से पैरों की अंगुलियों की स्थिति कैसी हो जाती है, वह भी दर्शाया गया है। पैरों के ऊपर हाथ के ऊपर हाथ है। बायां हाथ नीचे, उसके ऊपर दाहिना हाथ है। बायीं हथेेली नीचे होने पर भी उसकी पांचों उँगलियां इस तरह अंकित हैं कि पूर्णता दिखाई दे।
मुख्य प्रतिमा के दोनों ओर चँवरधारी देवों के ऊपर एक-एक कायोत्सर्ग अर्थात् खड्गासन प्रतिमाएँ और उनके ऊपर को भी एक-एक कायोत्सर्ग प्रतिमाएँ उकरित हैं। इनके भी पादपीठ बनाये गये हैं। कायोत्सर्गस्थ होने से दिगम्बरत्व स्पष्ट है। इस तरह पार्श्ववर्ती चार तीर्थंकर और एक मुख्य प्रतिमा होने से इसे पंचतीर्थी कहा जाएगा। कला की दृष्टि से भी यह अपनेआप में अनूठा उदाहरण है।
अनुमानतः यह प्रतिमा नौ से ग्यारहवीं शताब्दी की है, जिसके कई कारण हैं- 1. नौवीं शताब्दी से पीछे इसलिए नहीं जा सकते क्योंकि इसके चँवरधारी देवों में दायी ओर के देव के बायें हाथ में और बायीं ओर के देव के दाहिने हाथ में चँवर अंकित है। नौवीं-दसवीं शताब्दी के बाद से शास्त्रीयता की अपेक्षा सजावट पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा। अन्यथा प्राचीन प्रतिमाओं में चँवरधारी दाहिने हाथ से ही चँवर ढुराते दिखाये गये हैं, चाहे वे दायें खड़े हों या बायें। 2. इसी तरह सिंहासन के सिंहों के भी दायें और बायें पंजे उठाये हुए दिखाये गये हैं। 3. आसन में शार्दुल का अंकन। शार्दुल का अंकन खजुराहो की कला में प्रचुर मात्रा में मिलता है। खजुराहो के अधिकांश मंदिर-मूर्तियां दसवीं शताब्दी कीं हैं। उसकला और कारीगगरों की विशेषज्ञता का प्रभाव अन्य मूर्तियों पर रहता है। अतः यह सपरिकर प्रतिमा दसवीं शताब्दी के लगभग की ठहरती है।

— डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’