लघुकथा

दादा जी की छड़ी

दादा जी आज सुबह-सुबह सैर के लिए निकल ही रहे थे कि अचानक उनके पाँव ठिठक गए।और वे किसी चीज की तलाश में इधर-उधर,यहाँ-वहाँ घूमने लगे।
दादा जी कुछ परेशान लग रहे थे।उधर सैर में जाने के लिए देरी हो रही थी।
तभी उनका आठ साल का नन्हा पोता आया।और कहने लगा- “दादा जी!दादा,जी!आप क्या ढूँढ रहे हैं?”
दादा जी कुछ उद्वेलित और परेशान होकर जवाब देते हैं- “बेटा!मेरी छड़ी कहीं गुम हो गई है, मैं उसको ही ढूँढ रहा हूँ।”
फिर उनका पोता कहता है- “दादा जी आप रोज-रोज उस छड़ी को हाथ मे पकड़ कर क्यों जाते हैं?”आखिर उस छड़ी में ऐसा क्या है?”
अपने पोते के इस जिज्ञासा भरे प्रश्नों को सुनकर दादा जी आश्चर्यचकित हो कहते हैं- “ठीक है!ठीक है बेटा!इन सभी प्रश्नों के उत्तर मैं तुम्हे बाद में बताउँगा।पहले तुम मुझे यह बताओ कि क्या तुमने मेरी छड़ी को कहीं देखा है क्या?”
पोता कहता है- “नही दादा जी! पर छड़ी घूम गई है तो क्या हुआ, मैं तो आपकी छड़ी बन सकता हूँ न।आज आप मुझे छड़ी बना लीजिए।आपको जहाँ जाना होगा मैं ले जा सकता हूँ।”
इतना सुनते ही दादा जी अवाक रह गए।तब दादा जी कहते हैं- “बेटा तुम तो बहुत समझदार हो गए हो।जिस छड़ी के लिए मैं इतने समय से परेशान था। उसको तो तुमने झट से एक ही पल में दूर कर दिया। वाह!शाबाश!बेटा!”
और फिर दादा जी अपने पोते को सीने से लगा लेते हैं।और तभी दादा जी छड़ी के बारे में बताते हैं- “जैसे बुढापे में तुम मेरा सहारा बनके साथ चलना चाहते हो।वैसे ही सहारा हमारी छड़ी होती है बेटा!अब मुझे किसी छड़ी की आवश्यक्ता नही है!अब से तुम ही मेरे लिए छड़ी हो।”
दादा जी मन ही मन सोंचने लगते हैं- “काश!ऐसा संस्कार सभी बच्चों को मिल पाता,तो सभी को ऐसे पोता का सहारा मिल जाता।तभी पोता कहता है- “दादा जी क्या सोंच रहे हो?”दादा जी कुछ नही बेटा! कहते हुए फिर दोनों उत्साहित हो सैर के लिए निकल जाते हैं।
— अशोक पटेल “आशु”