भाषा-साहित्य

पुस्तकें मानव के जीवन का ज्ञानाधार हैं

पुस्तकों का महत्त्व हर युग में रहा है और आगे भी रहेगा। पुस्तकें हमारे जीवन का बहुत बड़ा खजाना है। पुस्तकों का जितना खर्च करने पर, उपयोग करने पर यह खजाना सदा बढ़ता रहता हैं। पुस्तकें मानव को जीवन  जीने की कला को सिखाती हैं। एक इंसान को सही रूप से इंसान बनाने का काम करती है। पुस्तके मानव के लिए बौद्धिक खजाना है। उसे तार्किक बनाती है।विवेकी बनाती है। आदरणीय एवं सम्मानीय बनाती है।अच्छी पुस्तकें इंसान को ज्ञान-मान- सम्मान दिलवाती हैं। इससे बड़ी बात एक इंसान को सच्चा इंसान बनाती है। बुराइयों का नाश करने हेतु इंसान को प्रेरित कर एक आदर्श समाज, राष्ट्र की प्रेरणा देने का उत्तम कार्य करती।पुस्तके हमें प्रेम करना सिखाती है एवं सदाचरण और उत्तम व्यवहार का संदेश देती। पुस्तकें बचपन से बुढ़ापे तक की साथी है। पुस्तकें मनुष्य को अमर कर देती है। मानव मर जाता है किंतु व्यक्ति के विचार पुस्तकों के माध्यम से जिंदा रहते हैं। स्वस्थ जीवन की तरह स्वस्थ मन को पुष्ट करती है। सदा सद्कार्य की ओर प्रेरित करती है।विश्व पुस्तक के रूप में यूनेस्को ने 23 अप्रैल 1995 को इस दिवस को मनाने की शुरुआत की थी।पेरिस में हुई एक आम सभा में यूनेस्को ने यह फैसला लिया था कि पुस्तकों के प्रति रुचि पैदा करने हेतु यह दिवस मनाया जाए।

23 अप्रैल को विलियम शेक्सपियर और प्रमुख स्पेनिश इतिहासकार इंका गार्सिलासो डे ला वेगा और मिगुएल डे सर्वेन्सट्स की पुण्यतिथि का प्रतीक है तो मैनुएल मेजिया वल्लेजो और मैरिस ड्रूम इस दिन पैदा हुए थे। इन साहित्यकारों को ध्यान में रखते हुए यूनेस्को ने यह फैसला लिया था कि इन साहित्यकारों की जन्म और मृत्यु इसी तारीख को होने की वजह से विश्व पुस्तक दिवस के रूप में मनाई जाए।”वर्ल्ड बुक डे” और विश्व कॉपीराइट डे 23 अप्रैल को मनाने की घोषणा हुई थी।
आज विश्व पुस्तक दिवस दुनिया के 100 से अधिक देशों में मनाया जाता है। हर वर्ष इस दिवस की थीम होती है जो हमें एक नया संदेश देती है। 2021 की थीम “एक कहानी साझा करें” थी। 2022 की थीम “पढ़ें तो आप कभी अकेला महसूस ना करें” है।कार्लाईल ने कहा था पुस्तकों का संकलन ही आज के युग का वास्तविक विद्यालय है।” डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था -“जिस दिन मेरे देश के युवा मंदिर-मस्जिदों की कतारों के बजाय पुस्तकालयों में कतार लगाने लग जाएंगे उस दिन भारत का निर्माण स्वत: होने लगेगा।” उनके निजी पुस्तकालय “राजगृह” में 50000 से भी ज्यादा किताबें थी।
विद्वान चार्ल्स विलियम इलियट ने कहा था-” पुस्तकें मित्रों में सबसे शांत व स्थिर है, वे सलाहकारों में सबसे सुलभ और बुद्धिमान होती हैं और शिक्षकों में सबसे धैर्यवान तथा श्रेष्ठ होती है।” डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था “पुस्तके वह साधन है जिसके माध्यम से हम विभिन्न संस्कृति एवं समाज के बीच सेतु का निर्माण कर सकते हैं।”
श्रेष्ठ पुस्तकें हमारे लिए ज्ञानार्जन कराती है।मार्गदर्शन देती है। हमारे भविष्य का निर्माण करती है और हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करती है। अच्छी पुस्तकें एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ज्ञान को पहुंचाकर हमारे ज्ञान संपदा को बढ़ाती है। पुस्तकें  ज्ञानियों को रत्नों से जड़ित माला के समान आनंद प्रदान करती है।मन को प्रफुल्लित करती है। सद्साहित्य  सदा संस्कृति का गौरव होता है। अच्छी पुस्तकें मानवीय मूल्यों का निर्माण कर आदर्श जीवन का मार्ग प्रशस्त करती है। उत्तम किताबें ज्ञान -ध्यान- विज्ञान और तर्क- वितर्क से अवगत तो कराती ही है साथ में एक नवीन दिशा भी प्रदान करती है। किताबें हमें संकट के समय मार्गदर्शन और दिग्दर्शन करती हैं। साथ में हमें किसी भी परिस्थिति में एक समान सम-नम रहने की शक्ति प्रदान करती है। हमे सदा किताबों से मित्रता करनी चाहिए। पुस्तकों से बड़ा कोई श्रेष्ठ मित्र नहीं है।पुस्तके मनुष्य जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है बाकी सब किस्सा है। सत्यता की कसौटी पर कसी हुई और यथार्थ से परखी गई पुस्तकों  में बहुत बड़ी ताकत है।वह पीढ़ियों को बदलने का सामर्थ्य रखती है।विश्व पुस्तक दिवस पर अच्छी पुस्तकों का संकलन कर उसे जरूर पढ़ें और औरों को भी पढ़ाएं उनमें (पाठकों में) जिज्ञासा तथा रुचि पैदा करनी चाहिए।अच्छी पुस्तकें हमारे अंत करण का परिमार्जन कर आत्माभीव्यक्ति का सशक्त माध्यम बन जाती है। आज के युवाओं को पुस्तकों को पढ़ाने के लिए पुस्तकालय की ओर रुख करना चाहिए। पुस्तकालय हमारे बौद्धिक संपदा का भंडार है। नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों में पुस्तकालय विश्व के गौरवशाली पुस्तकालयों में से थे।
आज के बच्चों के हाथों में हथियार के बजाय और मोबाइल के बजाय पेन और अच्छी पुस्तकों की जरूरत है। इन्हीं संस्कारों से परिवार, समाज, राष्ट्र और दुनिया में एक सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। जिसकी आज दुनिया में सबसे ज्यादा जरूरत है।आज के इंटरनेट के जमाने में ई- बुक तो सहज प्राप्त होती है किंतु साथ ही मन को दूषित करने वाला ज्ञान भी सहेज मिल रहा है।इससे बच्चों को एवं युवा पीढ़ी को बचाने की भी आवश्यकता है। तभी चरित्रवान पीढ़ी का कल्याण संभव है। पुस्तकों की दुनिया अपनी निराली है। इंटरनेट अपनी जगह है। पुस्तक और पुस्तकालय की हॉड़ इंटरनेट कभी नहीं  कर सकता है। हमें, इंटरनेट कभी भी पुस्तकों की गंध । पुस्तकों से खुशी नहीं दे सकता है।
— डॉ. कान्ति लाल यादव