कविता

गर्मी

ठंडी जाती गर्मी आती,
बड़ा खराब मौसम लाती ।
आग का गोला बन धरती जलती,
गरम-गरम सारा दिन लू चलती ।
चाय गर्म का दौर खत्म,
हाय-हाय गर्मी का सितम ।
भिन्न- भिन्न कोल्ड ड्रिंक सब पीते,
ताल-तलैया, कुए-बाबरी सब रीते ।
सूरज की किरणें तीर छोड़ती रहतीं पैने,
ओंठ सूखते, पल-पल प्यास, दर्द सब सहने  ।
बड़े आदमी एसी-कूलर का लुफ्त उठाते,
छोटे हाथ का पंखा झल-झल काम चलाते ।
गर्मी आती बड़ा सितम है ढाती,
बूंद-बूंद के लिए हर प्राणी को तरसाती ।
रातें कुछ ठंडी हो जातीं,
भोर सुहानी बन जातीं ।
साथी ! गर्मी में कम खाओ,
भरी दोपहरी में कहीं न जाओ ।
—  मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

नाम - मुकेश कुमार ऋषि वर्मा एम.ए., आई.डी.जी. बाॅम्बे सहित अन्य 5 प्रमाणपत्रीय कोर्स पत्रकारिता- आर्यावर्त केसरी, एकलव्य मानव संदेश सदस्य- मीडिया फोरम आॅफ इंडिया सहित 4 अन्य सामाजिक संगठनों में सदस्य अभिनय- कई क्षेत्रीय फिल्मों व अलबमों में प्रकाशन- दो लघु काव्य पुस्तिकायें व देशभर में हजारों रचनायें प्रकाशित मुख्य आजीविका- कृषि, मजदूरी, कम्यूनिकेशन शाॅप पता- गाँव रिहावली, फतेहाबाद, आगरा-283111