कविता

भोली-भाली चिड़िया हूँ

मैं घर आँगन की पहचान हूँ
मैं पेड़-पौधों की मुस्कान हूँ।
मैं भोर का सन्देशा लाती हूँ
मैं सारे जगत को जगाती हूँ।
मैं कलरव के गीत सुनाती हूँ
मैं रवि का स्वागत करती हूँ।
मैं भोली-भाली चिड़िया हूँ
मैं जागरण मैं ही निंदिया हूँ।
मैं नील-गगन का श्रृंगार हूँ
मैं बादलों का पुष्प-हार हूँ।
मैं फुलवारी की सँगिनी हूँ
मैं फूलों की मन मोहिनी हूँ।
पर!मैं व्यथित परेशान हूँ
मैं लोगों से बड़ी हैरान हूँ।
मैं बहुत प्यासी और भूखी हूँ
इसलिए तो मैं बहुत दुखी हूँ।
मैं चिड़िया पानी का प्यासी हूँ
मैं दाने के लिए बड़ी उदासी हूँ।

— अशोक पटेल “आशु”