सामाजिक

परिवर्तन

पिछले 20,30 सालों में धरती पर जितनी तेजी से परिवर्तन हुए हैं वो पिछले 300 सालों में नहीं हुए।

जीवन का हर पहलू प्रभावित हुआ है।
जलवायु परिवर्तन की बात ही ना करें तो भी देखेंगे कि समाज का पूरा स्वरूप ही बदल गया है।
आधुनिकता और विकास के चक्कर में हमने वो खो दिया जो मानवता की पहचान था।
प्रकृति से कृत्रिमता के ओर ये बदलाव इतनी तेजी से हुए जिसके लिए हम तैयार नहीं थे।

अच्छी बात ये रही कि बड़ी उम्र में बदलाव मुश्किल होते हैं तो प्रत्यक्ष रूप से नुकसान बहुत अधिक नहीं हुआ पर फिर भी अधिकांश लोग पिछली पीढ़ी के मुकाबले कम खुश हैं।
समस्या वो अप्रत्यक्ष प्रभाव है वो हमारी सोच पर पड़ा और जिसने बच्चों और बचपन को बुरी तरह प्रभावित किया है।

आज के बच्चों के दुर्भाग्य का एक ही कारण है, हमारे द्वारा उनपर थोपी कृत्रिमता।

सोच, खेल, उम्मीदें सब कृत्रिम कर दी हमने प्रकृति की श्रेष्ठ कृति की।

जैसे, समझदारी या प्रतिभा महत्वपूर्ण हो गई पर मासूमियत गायब हो गई।
जीत, पुरस्कार के मायने सीखा दिए हमने पर उनका आनंद को गया।

मेंढक, तितिली, चिड़िया, फूल के पीछे भागना गायब हो गया और tv फोन पर ही कार्टून की आभासी दुनिया में जीने लगे।

भाई बहन, दोस्त इतने रह गए कि ऊंगली पर गिने जा सकें पर आभासी संसार ने उन्हें वयस्कों और एलियंस की दुनिया के करीब ला दिया।

AC की हवा ने मिट्टी, धूल की परत ही खो गई।

Rocket science को केंद्र में रख हमने टेलिस्कोप दिला दिए पर तारों के नीचे दादी नानी की कहानी छीन लीं

— रवि कुमार शर्मा