लघुकथा

आत्मविश्वास का पिटारा

तपस्या केवल वन में जाकर और समाधि की अवस्था में बैठकर ही नहीं की जाती, तपस्या साधन-हीन गृहस्थी में आशा से अधिक उपलब्धि को भी कहा जाता है. आकाश की असीम उपलब्धि ने यह दिखा-सिखा दिया था.
आज से नौ साल पहले आकाश हमें ई.रिक्शा में मिला था. वह चौथी-पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाला बच्चा लग रहा था. उसकी मां भी आकाश के साथ थी. ई.रिक्शा में दो सीटें खाली थीं, हम भी बैठ गए.
“आंटी-अंकल नमस्ते.” अंजान आकाश ने अपनी सुसंस्कारिता का परिचय दिया था.
“नमस्ते बेटा, कहां जा रहे हो?” नमस्ते का जवाब देते हुए हमें बात आगे बढ़ाने का सिरा मिल गया था.
“क्रिकेट की प्रैक्टिस के लिए स्पोर्ट्स कम्प्लैक्स में.” तपाक से उसने जवाब दिया.
“Boller हो या Batsman?” क्रिकेट के रसिया पतिदेव ने पूछा.
“Batsman.” तुरंत ही वह बोला.
“Right hander, left hander?”
“Left hander.” जवाब देने में उसने तनिक भी देर नहीं लगाई.
“One down, two down?…”
“Opener.” पतिदेव का वाक्य पूरा होने से पहले ही उसका आत्मविश्वास चहका.
“स्पोर्ट्स कम्प्लैक्स यानी 50 रुपये आने के, 50 रुपये आने के.” हमने अंदाजा लगाया.
“मां दो घंटे उसके साथ बैठेंगी.” हमारे पोते के साथ भी तो कोई-न-कोई साथ जाता-बैठता है.
“कपड़ों-जूतों से भी वह साधन-संपन्न घराने का नहीं लग रहा था”. हमारी सोच जारी थी.
“लगन और प्रतिभा हो तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, वो सब इंतजाम हो जाता है.” ऐसा हम पढ़ते-सुनते आ रहे थे.
हमारी मंजिल आ गई थी, आकाश चहल से उस दिन इतनी ही बात हो पाई थी.
“जीत का छुपा रुस्तम: 19 साल के आकाश चहल ने 19वें ओवर में ही टीम की जीत पक्की कर दी थी.” दो दिन पहले समाचार पत्र में सुर्खी आई थी.
अगले दिन उसके “मैन ऑफ मैच” होने की खबर भी खेल जगत की मुख्य सुर्खी थी.
तीन मैचों की शृंखला में 2-1 से राजस्थान की टीम की जीत और आकाश चहल के “मैन ऑफ सीरीज” की खबर ने मन को मोह लिया.
उसकी उपलब्धि ने बता दिया था कि आकाश लंबी रेस के घोड़े हैं.
उसके आत्मविश्वास का पिटारा खाली तो कभी भी नहीं था, आज आत्मविश्वास से सराबोर लग रहा था.

One thought on “आत्मविश्वास का पिटारा

  1. आत्मविश्वास वस्तुतः एक मानसिक एवं आध्यात्मिक शक्ति है। आत्मविश्वास से ही विचारों की स्वाधीनता प्राप्त होती है और इसके कारण ही महान कार्यों के सम्पादन में सरलता और सफलता मिलती है। इसी के द्वारा आत्मरक्षा होती है। जो व्यक्ति आत्मविश्वास से ओत-प्रोत है, उसे अपने भविष्य के प्रति किसी प्रकार की चिन्ता नहीं रहती। उसे कोई चिन्ता नहीं सताती। दूसरे व्यक्ति जिन सन्देहों और शंकाओं से दबे रहते हैं, वह उनसे सदैव मुक्त रहता है। यह प्राणी की आंतरिक भावना है। इसके बिना जीवन में सफल होना अनिश्चित है।

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