कविता

अपने अंदर को झाँकें

हो सके तो हम,अपने अंदर को झाँकें
यहॉं-वहाँ हम,दूसरे को बाहर न ताकें।

हम गौर करें अपना,करें स्वआँकलन
स्वआत्मा के,आवाज का करें पालन।

हम स्वयं है अपना,कुशल मार्गदर्शक
यहॉं-वहाँ की बातें,करना है निरर्थक।

हम स्वयं हैं स्वप्रेरक,बने अपनी प्रेरणा
हम प्रकाशवान बने,न करें अवहेलना।

हम अपने कर्म-फल,को बनाएँ महान
इसी से मिलेगा,जगत में मान-सम्मान।

बनाले ले कुछ,अलग अपनी पहचान
बन जाएँ स्वच्छ छबि,का भला इंसान।

अपने कर्मों का रहे,हमे हरदम ध्यान
बने हम सभ्य मानव,इसका रहे ज्ञान।

हमारे व्यवहारों का,सभी करे गुणगान
हमसे भूल से न हो,किसी का अपमान।

हम अपने को ही सुधारें,जग बने महान
हम सुधरें जग सुधरेगा,यही है बड़ा ज्ञान।

— अशोक पटेल “आशु”

*अशोक पटेल 'आशु'

व्याख्याता-हिंदी मेघा धमतरी (छ ग) M-9827874578