गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

देश खूँटों में सिमटकर रह गया।
आदमी उनसे लिपटकर बह गया।।

अस्मिता , गौरव सभी जाने लगे,
गालियों को मंत्र कहकर सह गया।

खूँटियों पर टाँग दी हैं नीतियाँ,
चापलूसी से चिपककर लह गया।

छोड़कर सत का कठिनतम राजपथ,
असत में सपना सुलगकर रह गया।

पेड़ को साया सघन ही चाहिए,
वेदना की आग पलकर दह गया।

मुक्त होने की नहीं चाहत कभी,
खूँटा – पुराणों में उलझकर ढह गया।

आज खूँटा – पर्व की वासंतिका,
गीतिका में ‘शुभम’ पतझर कह गया।

—  डॉ.भगवत स्वरूप ‘शुभम’