कविता

वक्त की गर्दिश

ना झुकता है वक्त की गर्दिश
ना झुकता है जमाने की शान
झुक जाता है बेवस   आदमी
वक्त बदल देती है सबकी पहचान

ना झुकता है घमंड का चोला
ना झुकता है झूठा अभिमान
झुक जाती है चाल हमारी
झुक जाता है मजबूर इन्सान

ना झुकता है लोभ व लालच
ना झुकता है तृष्णा की मान
झुक जाता है मानव का तन मन
बदल जाती है वक्त की फरमान

ना झुकता है झुठी ठाठ बाट
ना झुकता है स्वाभिमानी की आन
झुक जाती है जमाने की नजारा
बदल जाता है मानव की पहचान

— उदय किशोर साह